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Does God Exist | Javed Akhter | Mufti Shamail - Lallantop

जावेद अख़्तर साहब के फैंस क्लब को जोर का झटका लगा है। इन्हें अपने मठाधीश की ऐसी दुर्गति की उम्मीद नहीं थी। मिथुन के फैंस मिथुन को पिटता हुआ नहीं देख सकते।  जिस प्रकार जावेद साहब पूरी डिबेट में दाएं बाएं की बाते करते रहे वैसे ही ये लोग भी कर रहे हैं। इनको लगा था अंसार रज़ा जैसा कोई 5 हजारी डिबेट करने आएगा जिसे जावेद साहब भिगोकर, फिर धो पटककर और अंत में निचोड़कर सूखा देंगे। लेकिन उल्टा हो गया। कमेंट्री करना और मैदान में उतरकर खेलना दोनो बातों में अंतर है। जावेद साहब इतने समय तक कमेंट्री कर रहे थे। एक मंच मिल जाता था जिसपर चढ़कर माइक पकड़ा हाथ मे और अपनी सुंदर शैली में कुछ भी बोलो बदले में सुनो तालियों की गड़गड़ाहट। उसमें आपसे क्रॉस क्वेश्चन करने वाला और आपके सवाल का जवाब देने वाला नहीं होता है। सिर्फ सुनने वाले लोग होते हैं। बड़ा ही आसान और मज़ेदार काम है। 

जावेद साहब के पास दो तरह के फैंस क्लब है। एक तो उनके लॉजिक का फैन और एक है उनके गीत उनकी रचनाओं का फैन.. गीत ग़ज़ल के फैंस पता नहीं कहाँ गए, लॉजिक के फैंस बड़ी संख्या में नज़र आ रहे हैं जो कल की डिबेट के बाद बौखलाए से शिकस्त महसूस किये घूम रहे हैं। जावेद साहब की नादानी इन्हें नज़र नहीं आ रही... ईश्वर है या नहीं क्या इस विषय में आपको महारत है जो आप मुंह उठाए डिबेट में जा बैठे? आप वैज्ञानिक है? आपको पता है सृष्टि कैसे बनी? ईश्वर है या नहीं इस विषय पर आपने कुछ पढ़ा भी नहीं है। और डिबेट में जा बैठे.. शायद दिमाग़ में वही नैरेटिव था.. मदरसे का मौलाना है.. अरे मौलाना है मुकम्मल इंसान थोड़े है.. कुर्ता पैजामा है वहीं स्टूडियो में लिटा के प्रेस कर देंगे। लेकिन मौलाना साहब ने जावेद साहब की बुद्धि का एमआरआई करके रिपोर्ट आवाम को पकड़ा दी। बात तो झटका लगने वाली है। और इसी तसलसुल में मैंने एक नज़्म लिखी है पढ़िए आप भी-

कहा गया

कि ख़ुदा एक वह्म है,

मैंने कहा

तो फिर ये कायनात किसकी तहरीर है?


हिसाब से देखो तो

अददात की दुनिया में

π का असीम सफ़र किसने तय किया?

जो कभी मुकम्मल नहीं,

मगर हर दायरे में

सच की तरह मौजूद है।


किस क़लम से लिखा गया

कि दो और दो

हर दौर में चार ही रहेंगे?

कौन-सा दफ़्तर था

जहाँ ये उसूल

क़ायम हुआ?

कौन-सा तख़्ता था

जहाँ ये क़ायदा लिखा गया?


फ़िज़िक्स गवाही देती है

हर हरकत का मुहर्रिक है,

हर असर का सबब है।

तो ये अजूबा-ए-वुजूद

बिला-सबब कैसे?

अगर कोई मुंतज़िम नहीं

तो ये तवाज़ुन कैसा?

अगर कोई हाकिम नहीं

तो ये क़ानून कैसा?


ख़ला को देखो वैक्यूम है,

मगर फ़ना नहीं।

ख़ामोशी में भी

क्वांटम की सरगोशी है,

ज़र्रात काँपते हैं, बग़ैर आवाज़ के।

अगर “कुछ नहीं” भी एनर्जी रखता है,

तो “सब कुछ”

किस इरादे से बँधा?


वक़्त

पीछे नहीं जाता,

आगे ही बहता है।

किस फ़ैसले ने

लम्हे को

वापसी से महरूम किया?


एंट्रॉपी कहती है

हर निज़ाम बिखरता है,

तो फिर

ज़िंदगी इतनी बा-निज़ाम क्यों है?

किसके हिफ़ाज़ती साये में

ये तर्तीब ज़िंदा है?


केमिया बोल उठती है

हर अनासिर

अपनी जगह पर क़ायम है,

ज़र्रा-सा इख़्तिलाफ़

और कायनात राख।

इलेक्ट्रॉन को

किसने सिखाया

कि वो अपने मदार से

ग़द्दारी न करे? अपने नाभिक में न गिरे

चार्ज को

किस क़ायदे ने बाँधा?


हयातियात कहती है—

DNA एक किताब है,

और किताब

बिला-मुसन्निफ़ नहीं होती।

चार हर्फ़,

मगर इंसान की पूरी तफ़्सीर

ये इत्तेफ़ाक़ नहीं,

ये हिकमत है।

दिल जानता है

कब धड़कना है,

रगें जानती हैं

कब रुकना नहीं।

किस मदरसे में

इन आज़ा को

तालीम दी गई?


असाबियात पूछती है

ख़याल एक सिग्नल है,

तो फिर

“मैं” कौन है

जो इस सिग्नल को

पहचानता है?


अर्थशास्त्र कहता है

हर सिस्टम में

इनपुट–आउटपुट बैलेंस चाहिए,

तो फिर

दुआ का रिज़ल्ट

किस बैलेंस शीट में दर्ज है?


क़ानून कहता है

हर जुर्म की सज़ा है,

तो ज़मीर

किस दस्तूर से चलता है

जो तन्हाई में भी

अदालत बन जाता है?

आपने कुछ गलत किया तो आँखें झुक 

जाती है।


जुग़राफ़िया गवाही देता है

ज़मीन का झुकाव

ज़र्रा-सा बदले

तो फ़सलें मर जाएँ।

सूरज थोड़ा क़रीब

तो धरती जहन्नम हो जाए

और थोड़ा दूर जाए

तो बर्फ़ सी जम जाए

किस हाथ ने

इस मीज़ान को

“मुनासिब” कहा?


नुजूम देखो

अर्बों सितारे,

लाखों कहकशाँ,

मगर कोई बग़ावत नहीं,

कोई टकराव नहीं।

इतनी वसीअ सल्तनत

बिला-सुल्तान?


और आख़िर में—

अगर ख़ुदा नहीं

तो ये तलाश क्यों?

ये बेचैनी क्यों?

ये सज्दा-सा एहसास

सीने में क्यों?

इनकार भी

उसी की निशानी है,

क्योंकि जो है ही नहीं

उससे झगड़ा नहीं होता।


नतीजा ये नहीं

कि ख़ुदा को साबित किया जाए 

नतीजा ये है

कि कायनात

उसके बग़ैर

पढ़ी ही नहीं जाती।

वो नज़र नहीं आता,

क्योंकि वो हर नज़र से

परे है।

वो पकड़ा नहीं जाता,

क्योंकि वो हर पकड़ से 

महफूज़ है।


और जहाँ अक़्ल

अपने आख़िरी हर्फ़ पर

रुक जाती है

वहीं

यक़ीन

सज्दे में उतरता है।


तो फिर डरो उस आग से 

जिसका ईंधन बनेंगे इंसान

और पत्थर।


बहरहाल जावेद साहब को महारत गीत ग़ज़ल कविताओं कहानियों में है। उसपर बात करनी चाहिए। कितने लोग हैं जो उनसे सीखना चाहते हैं.. लेकिन उन्हें अपने कपाल के भीतर चलने वाली खाज मिटानी है। 

Tariq Azeem Tanha



 

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