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ज़बान, तहज़ीब और जुग़राफ़िया: अल्फ़ाज़ का सफ़र और इंसानी शऊर की हक़ीक़त

दुनिया की तारीख़ को अगर किसी एक आइने में देखा जाए तो वो ज़बान है वही ज़बान जो इंसान की तहज़ीब (Culture) की रूह है, वही ज़बान जो जुग़राफ़िया (Geography) की परछाईं है। इंसान जहाँ बसता है, वहीं उसके अल्फ़ाज़ जन्म लेते हैं; जहाँ दरिया बहते हैं, वहाँ लफ़्ज़ भी रवाँ होते हैं; जहाँ रेगिस्तान है, वहाँ ताबिश (Heat) के सैंकड़ों इज़हार मिलते हैं, और जहाँ बर्फ़ की दुनिया है, वहाँ सरदी के रंग बेशुमार होते हैं। तारीख़ गवाह है कि इंसान ने जब पहली मर्तबा अपनी ज़िंदगी को तशकील दी, तो दरिया-ए-दजला और फरात के किनारों पर दी। यही वो मक़ाम था जहाँ बशर (Human) ने ख़ाना-बदोशी (Nomadism) छोड़कर स्थायित्व (Settlement) अपनाया। इसी सरज़मीन ने तहज़ीब को जन्म दिया और ज़बान को शक्ल दी। यही वजह है कि दरियाओं के नाम, पहाड़ों के नाम, समंदरों के नाम हर एक में उस इलाक़े की पहचान, उसकी रूह और उसकी तारीख़ समाई होती है। अगर हम दुनिया के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों पर नज़र डालें, तो हर ज़बान अपने माहौल का अक्स (Reflection) नज़र आती है। अरब के सहरा (Desert) में गर्मी के लिए दर्जनों अल्फ़ाज़ मिलते हैं, लेकिन बर्फ़ के लिए बहुत कम; वहीं ...