दुनिया की तारीख़ को अगर किसी एक आइने में देखा जाए तो वो ज़बान है वही ज़बान जो इंसान की तहज़ीब (Culture) की रूह है, वही ज़बान जो जुग़राफ़िया (Geography) की परछाईं है। इंसान जहाँ बसता है, वहीं उसके अल्फ़ाज़ जन्म लेते हैं; जहाँ दरिया बहते हैं, वहाँ लफ़्ज़ भी रवाँ होते हैं; जहाँ रेगिस्तान है, वहाँ ताबिश (Heat) के सैंकड़ों इज़हार मिलते हैं, और जहाँ बर्फ़ की दुनिया है, वहाँ सरदी के रंग बेशुमार होते हैं।
तारीख़ गवाह है कि इंसान ने जब पहली मर्तबा अपनी ज़िंदगी को तशकील दी, तो दरिया-ए-दजला और फरात के किनारों पर दी। यही वो मक़ाम था जहाँ बशर (Human) ने ख़ाना-बदोशी (Nomadism) छोड़कर स्थायित्व (Settlement) अपनाया। इसी सरज़मीन ने तहज़ीब को जन्म दिया और ज़बान को शक्ल दी। यही वजह है कि दरियाओं के नाम, पहाड़ों के नाम, समंदरों के नाम हर एक में उस इलाक़े की पहचान, उसकी रूह और उसकी तारीख़ समाई होती है।
अगर हम दुनिया के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों पर नज़र डालें, तो हर ज़बान अपने माहौल का अक्स (Reflection) नज़र आती है। अरब के सहरा (Desert) में गर्मी के लिए दर्जनों अल्फ़ाज़ मिलते हैं, लेकिन बर्फ़ के लिए बहुत कम; वहीं उत्तरी इलाक़ों में बर्फ़ के लिए बेशुमार ताबीरात (Expressions) मौजूद हैं, जबकि गर्मी के लिए एक-दो ही लफ़्ज़ काफी होते हैं। ये इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि जुग़राफ़ियाई हक़ीक़त (Geographical Reality) का असर है।
इसी तरह दरख़्त (Tree), नबातात (Plants) और माख़लूक़ात (Creatures) के नाम भी उसी ज़मीन से बंधे होते हैं जहाँ वो पाए जाते हैं। अरब में “रैहान” (Basil) है, यूरोप में वही “बेसिल” कहलाता है, और हर ज़बान उसे अपने लहजे में ढाल लेती है। यही इर्तिक़ा (Evolution) है यानी ज़बान का सफ़र, जो किसी मज़हब से नहीं बल्कि इंसानी तजुर्बे और माहौल से जुड़ा होता है।
अक्सर लोग ज़बान को मज़हबी पहचान से जोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन हक़ीक़त इससे बिलकुल मुख़्तलिफ़ है। ज़बान न तो किसी एक मज़हब की मिल्कियत होती है और न ही किसी एक क़ौम की। ये तो इंसानी इज्तिमाई ज़िंदगी (Collective Life) का नतीजा है, जो सदियों के तजुर्बात, तआमुल (Interaction) और तहज़ीबी इख़्तिलात (Cultural Exchange) से बनती है।
तारीख़ में जंगें भी हुईं, मुहाजरत (Migration) भी हुई, और तिजारत (Trade) भी इन तमाम अमल (Processes) ने ज़बानों को एक-दूसरे से मिलाया, बदला और निखारा। पंजाब में “दरख़्त” का इस्तेमाल, या दुनिया के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में एक ही चीज़ के मुख़्तलिफ़ नाम ये सब उसी तआमुल का नतीजा हैं।
इंसान अगर अपने अल्फ़ाज़ को समझ ले, तो वो अपने अतीत को समझ सकता है। और अगर वो अपनी ज़बान की असलियत को पहचान ले, तो उसे ये एहसास होगा कि फ़ख्र (Pride) अपनी तहज़ीब पर होना चाहिए, मगर तअस्सुब (Blind Bias) से नहीं। क्योंकि जब ज़बान को सियासी या मज़हबी हथियार बनाया जाता है, तो वो इल्म (Knowledge) का ज़रिया नहीं बल्कि तफरक़ा (Division) का सबब बन जाती है।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि ज़बान एक ज़िंदा हक़ीक़त है ये सांस लेती है, बदलती है, और वक्त के साथ आगे बढ़ती है। इसे किसी एक ख़ाने में कैद करना न मुमकिन है और न ही मुनासिब। असल हिकमत (Wisdom) यही है कि हम ज़बान को उसके वसीअ (Broad) मंजरनामे में समझें जहाँ इंसानियत, जुग़राफ़िया और तहज़ीब एक साथ मिलकर अल्फ़ाज़ की दुनिया तामीर करते हैं।
तारिक़ अज़ीम तनहा
Keywords:
ज़बान, लिसानियात (Linguistics), तहज़ीब, जुग़राफ़िया (Geography), इंसानी तारीख़, मआशरा (Society), अल्फ़ाज़ का इर्तिक़ा (Evolution of Language), सक़ाफ़त (Culture), इल्मी तजज़िया (Analysis), तहक़ीक़ (Research)
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