कभी-कभी एक मामूली सा मज़ाहिया वाक़िआ (Incident) इतनी गहरी हक़ीक़त को बेनक़ाब कर देता है कि बड़े-बड़े सियासी तजज़िये (Political Analyses) भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। “2×2 का जवाब” वाला यह किस्सा भी महज़ एक लतीफ़ा (Joke) नहीं, बल्कि हमारे दौर की सियासी फ़िक्र (Political Thinking) और बयानीये (Narrative) का आइना है।
जब एक बच्चा ये कहता है कि उसने “5” बताया और बाकी “11” तक पहुँच गए, तो ये सिर्फ़ जहालत (Ignorance) की निशानी नहीं, बल्कि एक ऐसे निज़ाम (System) की झलक है जहाँ सही जवाब की अहमियत कम और खुश करने की सियासत ज़्यादा अहम हो जाती है। यही वो नुक्ता (Point) है जहाँ मज़ाह, हक़ीक़त में तब्दील होता है।
सियासत में अक्सर देखा गया है कि बयानीया (Narrative) हक़ीक़त (Reality) पर भारी पड़ जाता है। सही जवाब “4” होता है ये बात भी सभी जानते है, मगर अगर महफ़िल (Power Circle) में “5” या “11” पसंद किया जा रहा हो, तो लोग उसी को दोहराने लगते हैं। ये अमल सिर्फ़ फ़र्दी (Individual) नहीं, बल्कि इज्तिमाई (Collective) सूरत इख़्तियार कर लेता है।
इस तरह की सियासी रवायत (Tradition) में असल मसला ये नहीं होता कि जवाब क्या है, बल्कि ये होता है कि किस जवाब से ताक़तवर तबक़ा (Power Structure) खुश होगा। नतीजा ये निकलता है कि इल्म (Knowledge) और सच्चाई (Truth) पीछे छूट जाते हैं, और तालीफ़ (Flattery) आगे बढ़ जाती है।
तारीख़ गवाह है कि जब भी किसी मुआशरे (Society) में सच बोलने का हौसला कम हो जाता है, वहाँ ग़लत बयानीये हावी हो जाते हैं। लोग सही और ग़लत के फ़र्क को समझते हुए भी खामोशी इख़्तियार कर लेते हैं, क्योंकि निज़ाम (System) की रज़ामंदी (Approval) उन्हें ज़्यादा अज़ीज़ होती है।
मीडिया (Media) और अवामी प्लेटफॉर्म्स ने इस मसले को और पेचीदा (Complex) बना दिया है। अब हर बयान फ़ौरन वायरल होता है, और लोग बिना तजज़िया (Analysis) के उसे क़ुबूल कर लेते हैं। यही वजह है कि “2×2” जैसे आसान सवाल भी सियासी बहस का हिस्सा बन जाते हैं।
असल सवाल ये नहीं कि जवाब “4” है या “5”, बल्कि ये है कि क्या हम सच्चाई को कबूल करने की सलाहियत (Ability) रखते हैं या नहीं। अगर एक मुआशरा इस मुकाम पर पहुँच जाए कि वहाँ सही जवाब बोलना मुश्किल हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि मसला सिर्फ़ सियासत का नहीं, बल्कि अवामी शऊर (Public Awareness) का भी है।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि मज़ाह (Satire) हमेशा महज़ हंसाने के लिए नहीं होता, बल्कि वो सोचने पर मजबूर करता है। “2×2” का यह लतीफ़ा भी हमें यही सिखाता है कि सियासत में असल काम खुश करना नहीं, बल्कि सच बोलना और उसे क़ायम रखना है। क्योंकि जब सच ग़ायब हो जाता है, तो फिर “4” और “11” में कोई फ़र्क नहीं रह जाता।
तारिक़ अज़ीम तनहा
Keywords
सियासत, तन्क़ीद (Criticism), बयानीया (Narrative), हुकूमत, अवाम (Public), तजज़िया (Analysis), मीडिया, सियासी मज़ाह (Political Satire), हक़ीक़त (Reality)
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