ऐसे बहुत से अशआर हैं, जिनका एक ही मिसरा
इतना मशहूर हुआ कि लोग दूसरे मिसरे को तो भूल ही गये। ऐसे ही चन्द मशहूर अशआर यहाँ
पेश हैं:
"ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता
है,
*वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।*"
"ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को
न मुँह लगा,
*छूटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई।"*
दुख़्तर-ए-रज़ = शराब
"भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल
जो किया,
*ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"*
"चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले,
*आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"*
*- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फिदवी*
"दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़
से,
*इस घर को आग लग गई,घर के चराग़ से।"*
"ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले
ज़ालिम,
*रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर
भी है।"*
"ख़ंजर चले किसी पे, तड़पते हैं हम
'अमीर',
*सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है।"*
"क़ैस जंगल में अकेला ही मुझे जाने
दो,
*ख़ूब गुज़रेगी, जो मिल बैठेंगे दीवाने
दो।"*
'मीर' अमदन भी कोई मरता है,
*जान है तो जहान है प्यारे।"*
"शब को मय ख़ूब पी, सुबह को तौबा
कर ली,
*रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई।"*
"शहर में अपने ये लैला ने मुनादी
कर दी,
"ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों
ने,
*लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा
पाई।"*
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