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दिल को हर लम्हा जलाने की ज़रूरत क्या है

मोहब्बत जब अपने अस्ल मफ़हूम में दिल में उतर जाए तो बहुत-सी रस्में, बहुत-से तकल्लुफ़ और बहुत-सी शिकायतें अपनी अहमियत खो देती हैं। इंसान को एहसास होने लगता है कि जो चीज़ दिल में मौजूद है, उसे बार-बार साबित करने की ज़रूरत नहीं होती। यही एहसास इस ग़ज़ल की बुनियाद है।
इस ग़ज़ल के अशआर में मोहब्बत, याद, तअल्लुक़, तग़ाफ़ुल और इंसानी रवैयों को सवालिया अंदाज़ में बयान किया गया है। ये सवाल किसी एक शख़्स से नहीं, बल्कि कभी महबूब से, कभी ख़ुद अपनी ज़ात से और कभी पूरे समाज से मुख़ातिब दिखाई देते हैं। हर शेर अपने अंदर एक फ़िक्र और एक पैग़ाम समेटे हुए है।

दिल को हर लम्हा जलाने की ज़रूरत क्या है,
फूल को आग लगाने की ज़रूरत क्या है।

दिल में मौजूद हो जब नूर-ए-मोहब्बत का चराग़,
घर में सौ दीप जलाने की ज़रूरत क्या है।

हम ने माना कि तिरा हुस्न क़यामत है मगर,
हर घड़ी नाज़ दिखाने की ज़रूरत क्या है।

दिल में मौजूद अगर यार का काशाना रहे,
फिर कहीं और ठिकाने की ज़रूरत क्या है।

जिस को आना ही नहीं लौट के वापस इक दिन,
उस को रिश्ते भी निभाने की ज़रूरत क्या है।

अहल-ए-दिल ख़ुद ही समझ लेते हैं आँखों की ज़बाँ,
उन को तफ़्सील सुनाने की ज़रूरत क्या है।

दिल में मौजूद है तस्वीर अगर यार की फिर,
रोज़ दीवार सजाने की ज़रूरत क्या है।

आदमी अपनी नज़र में भी गिरा करता है,
दूसरों को ही गिराने की ज़रूरत क्या है।

वक़्त जब छीन ही लेगा तिरी शोहरत इक दिन,
नाम पत्थर पे खुदाने की ज़रूरत क्या है।

जिस को सुनना ही नहीं है तिरी ख़ामोशी तक,
उस को आवाज़ लगाने की ज़रूरत क्या है।

ज़िक्र करनी ही है जब ख़ूबियाँ दुनिया भर में,
फिर मिरे ऐब गिनाने की ज़रूरत क्या है।

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल भी अदा है तेरी,
रोज़ नज़रों को चुराने की ज़रूरत क्या है।

तू अगर मेरा नहीं है तो शिकायत कैसी,
दिल को बेकार जलाने की ज़रूरत क्या है।

हम से बिछड़ा है तो फिर हम को भुला भी दे अब,
रोज़ सपनों में तो आने की ज़रूरत क्या है।

ख़ुद ही मर जाएँगे इक रोज़ तअल्लुक़ के शजर,
इन को जड़ से भी हिलाने की ज़रूरत क्या है।

जिस को मिल जाए तिरी याद का सरमाया कहीं,
उस को दुनिया भी कमाने की ज़रूरत क्या है।

इस ग़ज़ल का बुनियादी ख़याल यह है कि जिन चीज़ों की अस्ल मौजूदगी दिल में हो, उन्हें बार-बार ज़ाहिर करने की ज़रूरत नहीं रहती। मोहब्बत अगर सच्ची हो तो दिखावे की मोहताज नहीं होती, याद अगर गहरी हो तो तस्वीरों की ज़रूरत नहीं रहती, और तअल्लुक़ अगर दिलों में ज़िंदा हो तो लफ़्ज़ों से ज़्यादा ख़ामोशियाँ काम करती हैं।
उम्मीद है कि यह ग़ज़ल अपने क़ारईन के दिलों में वही कैफ़ियत पैदा करेगी जिसके एहसास से इसके अशआर वजूद में आए।

— तारिक़ अज़ीम तनहा

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