दो बार बिकने वाला वो ‘ग़ुलाम’ जो दिल्ली के तख़्त पर बैठा और सल्तनत-ए-मुस्लिम की बुनियाद रख गया
क़ुतबुद्दीन ऐबक तुर्कों के मशहूर ‘ऐबक’ क़बीले से ताल्लुक़ रखते थे। "ऐबक" तुर्की ज़बान का लफ़्ज़ है, जिसका मानी है "माह का मालिक" यानी "चाँद का स्वामी"। मुवर्रिख़ीन बयान करते हैं कि इस क़बीले के मर्द व ख़वातीन अपने हुस्न-ओ-जमाल के लिए मशहूर थे, लेकिन क़ुतबुद्दीन ऐबक इस एतिबार से अपने क़बीले के दूसरे अफ़राद जैसे ख़ूबसूरत नहीं थे।
आज से तक़रीबन आठ सौ बरस पहले अफ़ग़ानिस्तान में सुल्तान मुईज़ुद्दीन मोहम्मद ग़ौरी की हुकूमत थी। सुल्तान अपनी ऐश-ओ-इश्रत भरी ज़िंदगी के साथ-साथ अहल-ए-दरबार, मशीरों, उमरा और ग़ुलामों की क़द्रदानी के लिए भी जाना जाता था। उसके दरबार में एक ऐसा ग़ुलाम भी मौजूद था जिसने सुल्तान की तरफ़ से इनायत किए गए ख़ज़ाने को अपने पास रखने के बजाय महल के बाहर खड़े पहरेदारों, मुफ़लिसों और ज़रूरतमंदों में तक़सीम कर दिया।
उसकी इस दरियादिली ने अहल-ए-सल्तनत को हैरतज़दा कर दिया। यह वाक़िआ चर्चा का मौज़ू बना और आख़िरकार उसकी ख़बर ख़ुद सुल्तान तक जा पहुँची। सुल्तान ने उस सख़ी ग़ुलाम को अपने हुज़ूर तलब किया। वह ग़ुलाम क़ुतबुद्दीन ऐबक था। मोहम्मद ग़ौरी उसकी सख़ावत और फ़ैयाज़ी से इस क़दर मुतास्सिर हुआ कि उसे अपने ख़ास मुक़र्रबीन में शामिल कर लिया। यहीं से उसकी ज़िंदगी का एक नया बाब शुरू हुआ।
अपनी मशहूर किताब तबक़ात-ए-नासिरी में गौरी सल्तनत के मुवर्रिख़ मिन्हाज-उस-सिराज लिखते हैं कि इस वाक़िए के बाद क़ुतबुद्दीन ऐबक की तक़दीर करवट लेने लगी। सुल्तान ने उसे अहम सरकारी उमूर और दरबारी ज़िम्मेदारियाँ सौंपनी शुरू कर दीं। पहले उसे फ़ौजी सरदार बनाया गया और बाद में "आख़ोर" का ओहदा अता किया गया। उस ज़माने में आख़ोर शाही अस्तबल के निगहबान और सरपरस्त को कहा जाता था। यह मंसब सल्तनत के बेहद अहम ओहदों में शुमार होता था।
क़ुतबुद्दीन ऐबक उन चुनिंदा अफ़राद में से था जिन्हें ज़िंदगी ने बार-बार आज़माया। वह दो बार ग़ुलामों के बाज़ार में फ़रोख़्त किया गया। लेकिन यही शख़्स आगे चलकर हिन्दुस्तान में एक ऐसी सल्तनत की बुनियाद रखने वाला साबित हुआ जिसके असरात सदियों तक बाक़ी रहे। ऐबक ने ही उस वंश की बुनियाद रखी जिसे बाद में "ग़ुलाम वंश" कहा गया। हालांकि कई मुवर्रिख़ीन और जामिया जवाहरलाल नेहरू के तारीख़दान प्रोफ़ेसर नजफ़ हैदर के मुताबिक़ इन हुक्मरानों को ग़ुलाम नहीं बल्कि "तुर्क" या "ममलूक" बादशाह कहा जाना ज़्यादा दुरुस्त है।
ऐबक की इब्तिदाई ज़िंदगी ग़ुरबत और तंगी में गुज़री। कमसिनी ही में वह अपने अहल-ए-ख़ाना से जुदा हो गया और ग़ुलामों के बाज़ार में बेच दिया गया। ख़ुशनसीबी से उसे क़ाज़ी फ़ख़रुद्दीन अब्दुल अज़ीज़ कूफ़ी ने ख़रीदा। क़ाज़ी साहब ने उसे अपने फ़र्ज़न्द की तरह परवरिश दी। उसे दीन की तालीम दी गई, क़ुरआन पढ़ाया गया और फ़ौजी मश्क़ों में माहिर बनाया गया। घुड़सवारी, तीरअंदाज़ी और जंगी फ़ुनून में वह जल्द ही कमाल हासिल कर गया।
अच्छी सोहबत और उम्दा तरबियत का उस पर गहरा असर पड़ा। धीरे-धीरे उसके हुनर की शोहरत दूर-दूर तक फैलने लगी। मगर तक़दीर को कुछ और मंज़ूर था। क़ाज़ी फ़ख़रुद्दीन के इंतिक़ाल के बाद उनके बेटे ने ऐबक को एक ताजिर के हाथ बेच दिया। यही उसकी दूसरी फ़रोख़्त थी। बाद-अज़ाँ ग़ुलामों के बाज़ार में मोहम्मद ग़ौरी की नज़र उस पर पड़ी और उसने ऐबक को ख़रीद लिया। शायद यहीं से तारीख़ का रुख़ बदलना शुरू हो गया था।
क़ुतबुद्दीन ऐबक को तामीरात और मेमारियात से ख़ास दिलचस्पी थी। यही वजह है कि उसने बाद में क़ुतुब मीनार और क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद जैसी अज़ीम इमारतों की बुनियाद रखी।
जब मोहम्मद ग़ौरी ने हिन्दुस्तान की तरफ़ अपना रुख़ किया तो ऐबक ने हर मुहिम में उसका भरपूर साथ दिया। ख़ास तौर पर तराइन की दूसरी जंग में उसने ग़ैर-मामूली जंगी सलाहियत और बहादुरी का मुज़ाहिरा किया। इसी जंग में मोहम्मद ग़ौरी को फ़तह हासिल हुई। हालांकि इससे पहले तराइन की पहली जंग में राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान के हाथों उसे शिकस्त का सामना करना पड़ा था।
पहली नाकामी से सबक़ लेते हुए ग़ौरी ने अपनी जंगी हिकमत-ए-अमली में तब्दीली की और दूसरी जंग में कामयाबी हासिल कर ली। इस फ़तह के बाद उसने ऐबक को फ़ौज और सल्तनत में कई अहम ओहदे अता किए।
यहीं से हिन्दुस्तान में ऐबक के सियासी सफ़र का अस्ल आग़ाज़ हुआ। सन 1206 ईस्वी में मुईज़ुद्दीन मोहम्मद ग़ौरी के क़त्ल के बाद सल्तनत उत्तराधिकारी के मसले से दोचार हुई। चूँकि ग़ौरी ने किसी को अपना वली-अहद मुक़र्रर नहीं किया था, इसलिए उसके सबसे ताक़तवर और भरोसेमंद अमीरों में शामिल क़ुतबुद्दीन ऐबक को दिल्ली के तख़्त पर बिठाया गया।
इस तरह वह ग़ुलाम, जिसे कभी दो बार बाज़ार में बेचा गया था, दिल्ली की सल्तनत का मालिक बन गया।
अपने दौर-ए-हुकूमत में ऐबक ने मोहम्मद ग़ौरी की तौसीअ-पसंद पॉलिसी को जारी रखा। उसने अजमेर, सरस्वती, समाना, कहरान और हाँसी जैसे इलाक़ों को फ़तह किया। इसके बाद चंदावर की मशहूर जंग में कन्नौज के राजा जयचंद को शिकस्त देकर अपनी सल्तनत को और वसीअ बनाया। महज़ कुछ महीनों के अंदर राजस्थान से लेकर गंगा-जमुना के दोआब तक का एक बड़ा इलाक़ा उसके ज़ेर-ए-निगीं आ गया।
ऐबक को मेमारियात से जो दिलचस्पी थी, उसका सबसे बड़ा सुबूत क़ुतुब मीनार है। सन 1199 ईस्वी में उसने इस शानदार मीनार की तामीर शुरू करवाई। इसके साथ ही क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की बुनियाद भी रखी गई। अजमेर की फ़तह के बाद उसने एक और मशहूर मस्जिद तामीर करवाई, जिसे आज "ढाई दिन का झोंपड़ा" के नाम से जाना जाता है। इसे उत्तर भारत की शुरुआती मसाजिद में शुमार किया जाता है।
क़ुतबुद्दीन ऐबक की ज़िंदगी इस हक़ीक़त की ज़िंदा मिसाल है कि तक़दीर कभी-कभी ग़ुलामी की ज़ंजीरों से निकलकर ताज-ओ-तख़्त तक का सफ़र भी तय करा देती है। एक ऐसा शख़्स जिसे दो बार फ़रोख़्त किया गया, वही आगे चलकर हिन्दुस्तान की तारीख़ के सबसे अहम शख़्सियात में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा गया।
तारिक़ अज़ीम तनहा
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