अक्स-ए-रुख़्सार तिरा आब-ए-रवाँ में उतरे,
चाँद पानी में नहाएगा तो छा जाएगा।
दिल के वीरान शबिस्ताँ में तिरी याद का चाँद,
रौशनी बन के जो आएगा तो छा जाएगा।
दश्त-ए-इम्काँ में बहुत ख़ाक उड़ाई सब ने,
इश्क़ जब ख़ेमे लगाएगा तो छा जाएगा।
सिर्फ़ जीने से कहाँ होती है पहचान कोई,
दर्द को फ़न में जो लाएगा तो छा जाएगा।
ताज वालों को हमेशा यही धोका है कि बस,
ख़ौफ़ से मुल्क चलाएगा तो छा जाएगा।
जाम-ए-जम भी तिरी आँखों का मुक़ाबिल न हुआ,
कोई साक़ी इन्हें पाएगा तो छा जाएगा।
दश्त-ए-ग़ुर्बत में कोई नक़्श-ए-क़दम मिल जाए,
कारवाँ राह पे आएगा तो छा जाएगा।
नर्गिस-ए-शौक़ को दीदार की बारिश दे दे,
फूल हर सिम्त खिलाएगा तो छा जाएगा।
बज़्म-ए-अहबाब में तेरी ही सना होगी कभी,
कोई तेरा ज़िक्र उठाएगा तो छा जाएगा।
तेरी आँखों में जो देखेगा समन्दर का वक़ार,
अपनी हस्ती को भुलाएगा तो छा जाएगा।
बू-ए-गुल, रंग-ए-सहर, नूर-ए-कमर सब हैं मगर,
तू निगाहों में समाएगा तो छा जाएगा।
तेरे रुख़्सार की ताबिन्दगी ऐसी है कि माह,
अपनी किरनों को झुकाएगा तो छा जाएगा।
हुस्न जब पर्दा-ए-रंगीं से निकल कर शब में,
जल्वा-ए-ख़ास दिखाएगा तो छा जाएगा।
'तन्हा' उस शख़्स की तक़दीर बदलनी ही है अब,
तेरा पैग़ाम जो लाएगा तो छा जाएगा। तारिक़ अज़ीम तनहा
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