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Aurangzeb’s Tomb: A Political Pawn or a Progress Blocker?" औरंगज़ेब की कब्र: राजनीतिक मोहरा या प्रगति में रुकावट?

औरंगज़ेब की कब्र: राजनीति का खिलौना या प्रगति में रुकावट?

औरंगज़ेब, मुगल साम्राज्य का छठा बादशाह, 1707 में मर गया था, लेकिन उसकी साधारण सी कब्र आज भी भारत में हलचल मचाए हुए है। महाराष्ट्र के खुल्दाबाद में स्थित यह कब्र कुछ राजनीतिक दलों और समूहों के लिए विवाद का केंद्र बन गई है। कुछ इसे "मुगल अत्याचार" का प्रतीक मानकर हटाने की मांग कर रहे हैं, तो कुछ इसे इतिहास का हिस्सा बताकर बचाव कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या औरंगज़ेब मरने के बाद भी भारत की तरक्की में रोड़ा बना हुआ है? या फिर यह सब खोखले राष्ट्रवाद का दिखावा है, जिसे कुछ पार्टियाँ अपने फायदे के लिए भुना रही हैं? आइए, इस मुद्दे को गहराई से समझें—आज की राजनीति, औरंगज़ेब के समय भारत के पास कितना धन था, और आज की स्थिति क्या है।

कब्र को लेकर आज की सियासत

औरंगज़ेब का शासन (1658-1707) अपने समय में विशाल और शक्तिशाली था, लेकिन विवादों से भरा भी था। उसने गैर-मुस्लिमों पर जज़िया कर फिर से लागू किया, कुछ मंदिरों को तोड़ा, और सख्त इस्लामी नीतियाँ अपनाईं, जिसके चलते वह इतिहास में एक ध्रुवीकरण करने वाला शासक बन गया। आज, 2025 में, उसकी कब्र को लेकर बहस फिर से गरमा गई है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, जैसे विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी), बजरंग दल, और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से जुड़े कुछ नेता, इसे हटाने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह कब्र मुगल शासन के "अन्याय" की याद दिलाती है और इसे मिटाना हिंदू गौरव की बहाली का प्रतीक होगा।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी जैसे कुछ विपक्षी दलों के नेता, मसलन अबू आज़मी, औरंगज़ेब को एक कुशल शासक बताते हैं, जिसने भारत को एकजुट रखा। यह बहस अब सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है—यह वोट की सियासत का हिस्सा बन चुकी है। हर चुनाव से पहले ऐसे मुद्दे जानबूझकर उछाले जाते हैं ताकि धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को भड़काकर वोटरों को बाँटा जा सके। लेकिन क्या यह सब भारत की तरक्की से जुड़ा है? शायद नहीं। भारत की प्रगति आज तकनीक, शिक्षा, और वैश्विक व्यापार पर टिकी है, न कि 300 साल पुरानी कब्र को हटाने या बचाने पर। फिर भी, यह भावनात्मक रूप से लोगों को प्रभावित करता है, और यही वह ताकत है जिसे सियासी दल भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह "खोखला राष्ट्रवाद" नहीं तो और क्या है?

औरंगज़ेब के समय भारत का धन

औरंगज़ेब के दौर में भारत की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए हमें 17वीं सदी के वैश्विक संदर्भ में जाना होगा। उस समय भारत मुगल साम्राज्य के अधीन था, और यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। मशहूर ब्रिटिश अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के मुताबिक, 1700 के आसपास भारत की जीडीपी वैश्विक जीडीपी का 24-27% थी। यह आंकड़ा हैरान करने वाला है—उस समय दुनिया का हर चौथा पैसा भारत से जुड़ा था। मुगल खजाना चाँदी, सोने, और हीरों से भरा हुआ था, और भारत का व्यापार यूरोप से लेकर मध्य एशिया तक फैला हुआ था।
मुगल अर्थव्यवस्था का आधार मुख्य रूप से तीन चीजों पर था:
  1. कृषि कर: खराज जैसे करों से शाही खजाने में भारी आय होती थी। किसानों से ली जाने वाली यह रकम साम्राज्य की रीढ़ थी।
  2. व्यापार: भारत मसालों, कपड़ों (जैसे ढाका की मलमल), और रत्नों का केंद्र था। यूरोपीय व्यापारी, जैसे डच और अंग्रेज, यहाँ की समृद्धि से ललचाते थे।
  3. शाही संपत्ति: बादशाह और उनके दरबारियों के पास अकूत दौलत थी, जो करों और लूट से इकट्ठा की जाती थी।
औरंगज़ेब ने अपने शासन में दक्कन के कई इलाकों को जीता, जिससे साम्राज्य का विस्तार तो हुआ, लेकिन सैन्य खर्च भी बढ़ा। फ्रांसीसी यात्री फ्रançois बर्नियर ने लिखा था कि भारत के बाजारों में चहल-पहल थी और कारीगरों का काम दुनिया में बेजोड़ था। लेकिन यह धन आम लोगों तक नहीं पहुँचता था। मुगल समाज में भारी असमानता थी—शाही परिवार और अमीर दरबारी ऐशो-आराम में डूबे थे, जबकि किसान और मजदूर गरीबी में जीते थे। जज़िया जैसे करों ने गैर-मुस्लिमों पर बोझ डाला, लेकिन साम्राज्य को एकजुट रखने में भी मदद की। उस समय भारत की "जीडीपी" को आज की तरह मापा नहीं जाता था, लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि यहाँ की दौलत उस दौर में बेजोड़ थी।

आज भारत की आर्थिक स्थिति

अब बात करते हैं 21 मार्च, 2025 की। आज भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमानों के मुताबिक, 2024-25 में भारत की नाममात्र जीडीपी करीब 3.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 325 लाख करोड़ रुपये) होगी। अगर इसे खरीद शक्ति समता (PPP) से देखें, तो यह 13 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है, जो भारत को अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर लाता है। यह मुगल काल के 24-27% वैश्विक हिस्से से कम है—आज भारत की वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी 3.5-4% के आसपास है।
इसका मतलब यह नहीं कि भारत गरीब हो गया। असल में, औद्योगिक क्रांति और वैश्वीकरण ने पश्चिमी देशों और फिर चीन को आगे बढ़ा दिया, जबकि भारत औपनिवेशिक शासन और उसके बाद की चुनौतियों से जूझता रहा। आज भारत का धन अलग-अलग स्रोतों से आता है:
  • सेवा क्षेत्र: आईटी और सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री भारत की ताकत है। बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहर इसके गढ़ हैं।
  • विनिर्माण: मेक इन इंडिया जैसे अभियानों से औद्योगिक उत्पादन बढ़ा है।
  • तकनीक और स्टार्टअप: भारत में यूनिकॉर्न स्टार्टअप की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
प्रति व्यक्ति आय आज करीब 2,500-3,000 डॉलर सालाना है। यह मुगल काल के आम आदमी की तुलना में बेहतर है, क्योंकि तब ज्यादातर लोग निर्वाह स्तर पर जीते थे। आज धन ज्यादा बँटा हुआ है, हालाँकि अमीर-गरीब का फर्क अभी भी बड़ा है। भारत के पास आज नकदी से ज्यादा उसकी मानव पूँजी और वैश्विक स्थिति मायने रखती है।

औरंगज़ेब: प्रगति में रोड़ा या बहाना?

तो क्या औरंगज़ेब या उसकी कब्र भारत की तरक्की में रुकावट है? आर्थिक नजरिए से देखें तो बिल्कुल नहीं। भारत की चुनौतियाँ हैं—शिक्षा में कमी, बुनियादी ढाँचे की जरूरत, और वैश्विक प्रतिस्पर्धा—लेकिन इनका उस कब्र से कोई लेना-देना नहीं। यह विवाद सांस्कृतिक और राजनीतिक है, आर्थिक नहीं। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह ऐतिहासिक "गलतियों" को सुधारने की लड़ाई है, लेकिन सच यह है कि कब्र हटाने से न तो सड़कें बनेंगी, न ही निर्यात बढ़ेगा।
सांस्कृतिक रूप से, औरंगज़ेब का नाम हिंदू-मुस्लिम तनाव का प्रतीक बन गया है। उसकी नीतियों ने उस समय समाज को बाँटा था, और आज उसकी कब्र उस विभाजन को फिर से हवा दे रही है। सियासी दल इसे जानते हैं और इसका फायदा उठाते हैं। हर बार जब यह मुद्दा उठता है, यह वोटरों को भावनात्मक रूप से उकसाता है, लेकिन प्रगति के लिए ठोस कदमों की जगह बहस को बढ़ावा देता है। यह एक "खोखला शोर" है, जिसका असर सिर्फ वोटों और भावनाओं पर पड़ता है, न कि भारत के भविष्य पर।

तब और अब: एक तुलना
  • धन का बँटवारा: औरंगज़ेब के समय दौलत शाही खजाने तक सीमित थी; आज यह ज्यादा लोगों तक पहुँचती है, हालाँकि असमानता बरकरार है।
  • वैश्विक स्थिति: तब भारत आर्थिक महाशक्ति था; आज यह तेजी से उभरता हुआ देश है, जो अभी अमेरिका और चीन से पीछे है।
  • असली चुनौतियाँ: भारत की तरक्की नीतियों, नवाचार, और शिक्षा पर निर्भर है, न कि पुरानी शिकायतों पर।
निष्कर्ष: एक खोखला तमाशा

औरंगज़ेब की कब्र को लेकर जो गुल खिलाए जा रहे हैं, वह असल में एक सियासी तमाशा है। यह पार्टियों के लिए वोट की फसल काटने का जरिया हो सकता है, लेकिन भारत की तरक्की को न बढ़ाता है, न रोकता है। मुगल काल की शान से लेकर आज की आधुनिक महत्वाकांक्षा तक, भारत की कहानी मजबूती की है, बदले की नहीं। औरंगज़ेब न तो हमारी प्रगति का खलनायक है, न ही उसकी कब्र कोई कुंजी। असली मंच कब्रिस्तान में नहीं, बल्कि स्कूलों, कारखानों, और दफ्तरों में है—वहीं भारत का भविष्य लिखा जा रहा है।

-तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

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