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Showing posts from July, 2018

बारिशे

बारिशें  गर्दिशों  में हैं लेकिन दामन मेरा, भीग  गया  हैं फिर  मेरे आँसुओ से  ही!                                                तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

रविश का लेख

रवीश का लेखः औरंगज़ेब जिसने आखिरी वक्त में कहा था ‘मैं अजनबी की तरह आया और अजनबी की तरह जा रहा हूं। औरंगज़ेब और आरक्षण। इससे ज़्यादा लिखने की कोई ज़रूरत नहीं है। इन दो शब्द...