"गटर में डूबती जिंदगी" दोपहर की चिलचिलाती धूप में गटर का ढक्कन खुला हुआ था। वह गली सुनसान थी। इतनी धूप में कोई अपने घर से बाहर नहीं निकलना चाहता था। गटर के उस गड्ढे से रह-रहकर पानी के कुलबुलाने की आवाज़ आ रही थी। थोड़ी देर बाद एक सिर बाहर निकला। इधर उधर देखा और फिर वह पूरा का पूरा आदमी उस गड्ढे से बाहर आ गया। गटर के काले बदबूदार पानी से नहाया हुआ। सूरज की तरफ देख आप भेज कर उसने गटर का ढक्कन बंद कर दिया। पसलियों से चिपके उस शरीर में शायद जान नहीं थी। केवल शरीर था पर आत्मा मर चुकी थी। इसलिए उस गटर के बदबूदार पानी में डुबकी लगाने पर उसकी आत्मा नहीं तिलमिलाई। उसने पास रखी अपनी शर्ट उठाई और थोड़े आगे चलकर एक सार्वजनिक नल के नीचे बैठ गया। काफी देर तक बैठा रहा और फिर उठकर खड़ा हो गया। शरीर पर लिपटे मैले कपड़ों का पानी जब निथर गया तो अपनी शर्ट कंधे पर रखकर धीरे धीरे चलने लगा। काफी देर तक चलता रहा पता नहीं मंजिल क्या थी उसकी। उसके कदम नगर पालिका के गेट के सामने जाकर रुक गए। अंदर जाकर देखा तो बड़े बाबू किसी से बातचीत कर रहे थे। वही आंगन में खड़ा रहा। शायद चिलचिलाती धूप का कोई असर नहीं ...
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