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पीर-ए-कामिल: उमेरा अहमद के शाहकार का अदबी और रूहानी मुताला | Peer-e-Kamil Review | Tariq Azeem Tanha

  पीर-ए-कामिल: तिश्नगी-ए-रूह से तकमील-ए-वजूद तक का सफ़र उमेरा   अहमद के शाहकार का एक अदबी , फ़लसफ़ियाना और रूहानी मुताला कुछ किताबें पढ़कर ख़त्म हो जाती हैं , कुछ याद रह जाती हैं और कुछ इंसान के भीतर उतरकर उसके सोचने का अंदाज़ बदल देती हैं। पीर-ए-कामिल मेरे लिए इसी आख़िरी क़िस्म की तख़्लीक़ है। दुनिया के अदबी सरमाए में ऐसी तख़्लीक़ात की कमी नहीं जिनमें मुहब्बत के अफ़साने हैं , इंसानी जज़्बात की रंगारंगी है , ज़िंदगी के तल्ख़ तजुर्बात हैं और फ़लसफ़े की पेचीदा गुत्थियाँ हैं। मगर कभी-कभी कोई तख़्लीक़ इन तमाम अनासिर को इस तरह एक-दूसरे में पिरो देती है कि वह महज़ एक कहानी नहीं रहती , बल्कि इंसानी वजूद के मुताले का एक मुकम्मल तजुर्बा बन जाती है। उमेरा अहमद का नावेल पीर-ए-कामिल मेरे लिए ऐसी ही एक तख़्लीक़ है। मैं इसे सिर्फ़ एक पसंदीदा नावेल नहीं मानता , बल्कि उन किताबों में शुमार करता हूँ जिनकी अज़मत का अंदाज़ा उनके आख़िरी सफ़्हे तक पहुँचकर नहीं , बल्कि उन्हें पढ़ने के बाद अपने भीतर पैदा होने वाले सवालों से होता है। मेरे लिए इस नावेल की सबसे बड़ी ख़ूबी यह नहीं कि इसकी कहानी द...

बनहेरा टांडा का नौजवान: शबाब की सरमस्ती या मुस्तक़बिल की तामीर? | तारिक़ अज़ीम 'तनहा' | Banhera Tanda

बनहेरा टांडा का नौजवान: शबाब की सरमस्ती या मुस्तक़बिल की तामीर? |  एक गाँव की फ़िक्र , नौजवानों की ग़फ़लत और ज़ेहन की वीरानी का सवाल तहरीर: तारिक़ अज़ीम ' तनहा ' किसी बस्ती की अस्ल पहचान उसके बुलंद मकानों , वसीअ सड़कों , चमकती गाड़ियों और लोगों के ज़ाहिरी ठाठ-बाठ से नहीं होती , बल्कि उसके अफ़्कार , इल्म , किरदार और नस्ल-ए-नौ की फ़िक्री सतह से होती है। जिस बस्ती के नौजवानों के सीने में बुलंद ख़्वाब , ज़ेहन में सवाल , निगाहों में बसीरत और दिल में कुछ कर गुज़रने का जज़्बा मौजूद हो , उस बस्ती का मुस्तक़बिल पुरउम्मीद होता है। लेकिन जहाँ शबाब तो हो , सरगर्मी तो हो , जिस्मानी नुमाइश का शौक़ तो हो , मगर इल्म की तलब , फ़िक्र की गहराई और मुस्तक़बिल की तामीर का एहसास कमज़ोर पड़ने लगे , वहाँ ठहरकर अपने सामूहिक मिज़ाज का मुहासबा करना ज़रूरी हो जाता है। मेरा गाँव बनहेरा टांडा है। इस मिट्टी से मेरी वाबस्तगी महज़ पैदाइश या रिहाइश का रिश्ता नहीं , बल्कि एक जज़्बाती और फ़िक्री रिश्ता भी है। इसी बस्ती की गलियों में लोग बड़े होते हैं , इसी की आबोहवा में बच्चों के ख़्वाब परवान चढ़ते हैं और इ...

हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए | ग़ज़ल — तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए — तारिक़ अज़ीम 'तनहा' की ग़ज़ल और तशरीह शायर: तारिक़ अज़ीम 'तनहा' सिन्फ़: ग़ज़ल ज़बान: उर्दू-फ़ारसी आमेज़ हिंदुस्तानी मौज़ू: इश्क़, हिज्र, इंसानी ख़्वाहिश, किरदार, रूहानियत, रुस्वाई और जुनूँ ग़ज़ल — देवनागरी लिपि हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए, अश्क़ों का नूर आँख से बहना भी चाहिए। यूँ तो तेरी ज़बाँ पे है जन्नत की आरज़ू, चेहरे से तेरे लगता है दुनिया भी चाहिए। मंज़िल का शौक़ दे दिया तो हौसला भी दे, ये मैंने कब कहा मुझे रास्ता भी चाहिए। हुस्न-ओ-जमाल आपका काफ़ी नहीं जनाब, किरदार का ये फूल महकना भी चाहिए। हर शै में तू अयाँ है तो पर्दा है किस लिए, नज़रों को अब मेरी तेरा जल्वा भी चाहिए। रुस्वाइयों का ताज तो सर पर सजा लिया, अब इसके साथ थोड़ा-सा चर्चा भी चाहिए। 'तनहा' किसी मक़ाम पे ठहरा नहीं है इश्क़, इसको जुनूँ के साथ तमाशा भी चाहिए। — तारिक़ अज़ीम 'तनहा' Ghazal in Roman Urdu Hijraan ki raat hai to ujaala bhi chahiye, Ashkon ka noor aankh se behna bhi chahiye. Yoon to teri zabaan pe hai jannat...