पीर-ए-कामिल: उमेरा अहमद के शाहकार का अदबी और रूहानी मुताला | Peer-e-Kamil Review | Tariq Azeem Tanha
पीर-ए-कामिल: तिश्नगी-ए-रूह से तकमील-ए-वजूद तक का सफ़र उमेरा अहमद के शाहकार का एक अदबी , फ़लसफ़ियाना और रूहानी मुताला कुछ किताबें पढ़कर ख़त्म हो जाती हैं , कुछ याद रह जाती हैं और कुछ इंसान के भीतर उतरकर उसके सोचने का अंदाज़ बदल देती हैं। पीर-ए-कामिल मेरे लिए इसी आख़िरी क़िस्म की तख़्लीक़ है। दुनिया के अदबी सरमाए में ऐसी तख़्लीक़ात की कमी नहीं जिनमें मुहब्बत के अफ़साने हैं , इंसानी जज़्बात की रंगारंगी है , ज़िंदगी के तल्ख़ तजुर्बात हैं और फ़लसफ़े की पेचीदा गुत्थियाँ हैं। मगर कभी-कभी कोई तख़्लीक़ इन तमाम अनासिर को इस तरह एक-दूसरे में पिरो देती है कि वह महज़ एक कहानी नहीं रहती , बल्कि इंसानी वजूद के मुताले का एक मुकम्मल तजुर्बा बन जाती है। उमेरा अहमद का नावेल पीर-ए-कामिल मेरे लिए ऐसी ही एक तख़्लीक़ है। मैं इसे सिर्फ़ एक पसंदीदा नावेल नहीं मानता , बल्कि उन किताबों में शुमार करता हूँ जिनकी अज़मत का अंदाज़ा उनके आख़िरी सफ़्हे तक पहुँचकर नहीं , बल्कि उन्हें पढ़ने के बाद अपने भीतर पैदा होने वाले सवालों से होता है। मेरे लिए इस नावेल की सबसे बड़ी ख़ूबी यह नहीं कि इसकी कहानी द...