पायल भटनागर की वायरल ग़ज़ल का अरूज़ी जायज़ा | वज़्न, बहर और तक़्तीअ की पड़ताल | Payal Bhatnagar | Tariq Azeem Tanha
वायरल ग़ज़ल बनाम फ़न्न-ए-शायरी: पायल भटनागर की ग़ज़ल का वज़्न और अरकान की कसौटी पर जायज़ा क्या किसी ग़ज़ल का लोकप्रिय हो जाना उसके फ़न्नी ऐबों को भी ख़ूबी में बदल देता है? क्या दिल को छू लेने वाले अशआर के लिए बहर की पाबंदी से आज़ादी ली जा सकती है? और क्या किसी शेर की मक़बूलियत ही उसकी शायरी होने की सबसे बड़ी दलील है? सोशल मीडिया के इस दौर में शायरी की दुनिया पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा वसीअ हो गई है। अब किसी शायर को अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए किसी बड़े मुशायरे, अदबी रिसाले या नामवर शायर की ताईद का मोहताज नहीं रहना पड़ता। एक वीडियो, एक अच्छी आवाज़, दिल को छू लेने वाला मिसरा और मुनासिब संगीत, कभी-कभी इतना ही किसी कलाम को लाखों लोगों तक पहुँचाने के लिए काफ़ी होता है। मगर इस नई दुनिया में एक सवाल अपनी पूरी अहमियत के साथ मौजूद है: क्या किसी कलाम का वायरल होना और उसका फ़न्नी तौर पर मुकम्मल होना एक ही बात है? इसी सवाल के हवाले से पायल भटनागर जी की इन दिनों चर्चा में रहने वाली ग़ज़ल का जायज़ा लेना दिलचस्प होगा। उनकी ग़ज़ल के कुछ अशआर ज़िंदगी, मौत, यादों, मोहब्बत और इंस...