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बनहेरा टांडा का नौजवान: शबाब की सरमस्ती या मुस्तक़बिल की तामीर? | तारिक़ अज़ीम 'तनहा' | Banhera Tanda | Part 1

बनहेरा टांडा का नौजवान: शबाब की सरमस्ती या मुस्तक़बिल की तामीर? | Part 1

एक गाँव की फ़िक्र, नौजवानों की ग़फ़लत और ज़ेहन की वीरानी का सवाल

तहरीर: तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

किसी बस्ती की अस्ल पहचान उसके बुलंद मकानों, वसीअ सड़कों, चमकती गाड़ियों और लोगों के ज़ाहिरी ठाठ-बाठ से नहीं होती, बल्कि उसके अफ़्कार, इल्म, किरदार और नस्ल-ए-नौ की फ़िक्री सतह से होती है। जिस बस्ती के नौजवानों के सीने में बुलंद ख़्वाब, ज़ेहन में सवाल, निगाहों में बसीरत और दिल में कुछ कर गुज़रने का जज़्बा मौजूद हो, उस बस्ती का मुस्तक़बिल पुरउम्मीद होता है। लेकिन जहाँ शबाब तो हो, सरगर्मी तो हो, जिस्मानी नुमाइश का शौक़ तो हो, मगर इल्म की तलब, फ़िक्र की गहराई और मुस्तक़बिल की तामीर का एहसास कमज़ोर पड़ने लगे, वहाँ ठहरकर अपने सामूहिक मिज़ाज का मुहासबा करना ज़रूरी हो जाता है।

मेरा गाँव बनहेरा टांडा है। इस मिट्टी से मेरी वाबस्तगी महज़ पैदाइश या रिहाइश का रिश्ता नहीं, बल्कि एक जज़्बाती और फ़िक्री रिश्ता भी है। इसी बस्ती की गलियों में लोग बड़े होते हैं, इसी की आबोहवा में बच्चों के ख़्वाब परवान चढ़ते हैं और इसी के माहौल से आने वाली नस्लों की सोच शक्ल अख़्तियार करती है। लिहाज़ा, जब मैं अपने गाँव के नौजवानों के बारे में सोचता हूँ, तो दिल में एक सवाल बार-बार सर उठाता है: क्या हमारी जवानी का तसव्वुर महज़ जिस्मानी कशिश, इश्क़-मिज़ाजी, दिखावे और दोस्तों की महफ़िलों तक महदूद होता जा रहा है?

यह सवाल किसी शख़्स की तौहीन के लिए नहीं, बल्कि उस फ़िक्र की तलाश में है जो एक नौजवान को महज़ उम्र के लिहाज़ से जवान नहीं, बल्कि ज़ेहन, किरदार और अमल के एतबार से भी बुलंद बनाती है।

मेरे सामने गाँव के तक़रीबन सत्रह-अठारह ऐसे नौजवानों का तसव्वुर है जिनकी उम्र सत्रह से पच्चीस बरस के दरमियान है। इनमें कुछ देहरादून की यूनिवर्सिटियों में तालीम हासिल कर रहे हैं, तो कुछ रुड़की के मदरहुड और कोर जैसे तालीमी इदारों से वाबस्ता हैं। यह उम्र इंसान की ज़िंदगी का एक अहम संग-ए-मील है। इसी दौर में मुस्तक़बिल की कई राहें खुलती हैं, ज़ेहन में इल्मी प्यास पैदा होती है, शख़्सियत में वक़ार आता है और इंसान अपने वजूद की अस्ल क़ीमत पहचानने की कोशिश करता है।

लेकिन अगर इसी उम्र में किसी नौजवान की दिलचस्पियों का मरकज़ सिर्फ़ लड़कीबाज़ी, सोशल मीडिया पर अपनी धाक जमाना, दबंगई के अंदाज़ में रीलें बनाना और जिम में अपने जिस्म की नुमाइश करना बन जाए, तो सवाल उठना लाज़िम है। आख़िर हमारी जवानी की मंज़िल क्या है, महज़ लोगों की निगाहों में आना या अपनी सलाहियतों से दुनिया में कोई मक़ाम हासिल करना?

1. मुस्तक़बिल से ग़फ़लत

शबाब इंसानी ज़िंदगी का एक दिलकश मगर निहायत ज़िम्मेदार दौर है। इस उम्र में ख़्वाब भी रंगीन होते हैं, जज़्बात भी पुरजोश होते हैं और दुनिया को अपने अंदाज़ में जीत लेने की तमन्ना भी शिद्दत रखती है। मगर इसी दौर में अगर इंसान अपने जज़्बात पर क़ाबू रखना न सीखे, तो उसकी क़ुव्वत उसी के लिए ज़ाया होने का सबब बन सकती है। जवानी का हुस्न सिर्फ़ चेहरे की रौनक़, जिस्म की तराश या लिबास की दिलकशी में नहीं होता। उसका अस्ल हुस्न ज़ेहन की रौशनी, किरदार की पाकीज़गी, निगाह की बुलंदी और अमल की पुख़्तगी में होता है।

किसी लड़की से बात करना कोई ग़लत बात नहीं। किसी की तरफ़ मायल होना फ़ितरत का हिस्सा है। इश्क़-मोहब्बत भी इंसानी ज़िंदगी के दिलकश तजुर्बात में से हैं। मगर जब इंसान की तमाम तवज्जोह इसी एक पहलू पर सिमट जाए, जब उसकी रोज़मर्रा की गुफ़्तगू का सबसे बड़ा मौज़ू यही हो कि कौन किस लड़की से बात करता है, किसकी किससे दोस्ती है, कौन किसे पसंद करता है और किसकी कितनी पहुँच है, तो यह महज़ दिलचस्पी नहीं रहती; यह तरजीहात के बिगड़ने की अलामत बन सकती है।

ज़िंदगी में इश्क़ की अपनी जगह है, मगर इश्क़ को अपनी पूरी ज़िंदगी का मक़सद बना लेना अक़्लमंदी नहीं। मोहब्बत इंसान को बेहतर भी बना सकती है, बशर्ते उसके साथ एहतराम, ज़िम्मेदारी और ख़ुद्दारी मौजूद हो। लेकिन अगर किसी की तमाम फ़िक्र दूसरे की तवज्जोह हासिल करने में ख़र्च होने लगे, तो वह अपनी सलाहियतों की एक बड़ी दुनिया से महरूम रह सकता है।

ज़रा सोचिए, जिस उम्र में किसी नौजवान को अपने इल्म में इज़ाफ़ा करना चाहिए, अपने पेशे की तैयारी करनी चाहिए, कोई हुनर सीखना चाहिए, अपने वालिदैन की उम्मीदों पर ग़ौर करना चाहिए और अपने मुस्तक़बिल की बुनियाद रखनी चाहिए, उसी उम्र में अगर उसकी सबसे बड़ी मशग़ूलियत लोगों को मुतअस्सिर करना और अपनी शख़्सियत का दिखावा करना हो, तो वह अपने साथ कितना बड़ा नुक़सान कर सकता है। यहाँ मसला मोहब्बत का नहीं, ग़फ़लत का है। मसला दोस्ती का नहीं, अपनी ज़िम्मेदारियों को फ़रामोश कर देने का है। मसला जवानी का नहीं, जवानी की क़द्र न पहचानने का है।

2. हमारे ज़ेहन की दुनिया

किसी नौजवान से न्यूटन के क़वानीन-ए-हरकत के बारे में पूछिए। उससे दरियाफ़्त कीजिए कि केप्लर ने सय्यारों की हरकत के बारे में क्या बताया था। उससे पूछिए कि ज़मीन सूरज के गिर्द किस तरह गर्दिश करती है, गर्दिश क्या है, बिजली किस तरह पैदा होती है और वह मोबाइल फ़ोन जिसे वह दिन-रात इस्तेमाल करता है, सदियों की इल्मी तरक़्क़ी का नतीजा किस तरह बना। मुमकिन है कि उसे इनमें से कुछ सवालों के जवाब मालूम हों और कुछ के न हों। यह कोई शर्म की बात नहीं। दुनिया का कोई इंसान तमाम उलूम पर उबूर नहीं रखता। हर शख़्स का अपना मैदान, अपनी सलाहियत और अपनी दिलचस्पी होती है।

मगर अस्ल सवाल यह है कि क्या उसके अंदर जानने की तिश्नगी बाक़ी है? क्या वह किसी नई बात को सुनकर उसके बारे में और जानना चाहता है? क्या उसके ज़ेहन में कभी यह सवाल पैदा होता है कि कायनात किस निज़ाम के तहत काम करती है? क्या वह इस बात पर ग़ौर करता है कि इंसानी अक़्ल ने सदियों के तजुर्बों, तहक़ीक़ और तजस्सुस के ज़रिये दुनिया को किस हद तक बदल दिया है?

इल्म की कमी से ज़्यादा ख़तरनाक इल्म की ज़रूरत का एहसास ख़त्म हो जाना है। न्यूटन का नाम याद कर लेना ही दानिशमंदी नहीं और केप्लर के क़वानीन बयान कर देना ही बसीरत की आख़िरी मंज़िल नहीं। अस्ल दानिशमंदी यह है कि इंसान अपने माहौल को समझने की कोशिश करे, अपने तसव्वुरात को दलील की कसौटी पर परखे और जहाँ उसे कुछ मालूम न हो, वहाँ सीखने से गुरेज़ न करे।

आज दुनिया आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष विज्ञान, जैव-तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा और डिजिटल मआशियात के मैदान में तेज़ी से आगे बढ़ रही है। दुनिया के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में नौजवान अपनी तालीम और महारत के ज़रिये नए इजादात कर रहे हैं, कारोबार क़ायम कर रहे हैं, मुश्किल मसाइल का हल निकाल रहे हैं और अपनी ज़िंदगी के साथ-साथ अपने समाज की सूरत भी बदल रहे हैं।

उनके सामने भी मुश्किलात हैं। उनके पास भी जज़्बात, दोस्तियाँ, मोहब्बतें और ज़ाती ख़्वाहिशात हैं। मगर बहुत-से नौजवान अपनी दिलचस्पियों के साथ-साथ इल्म और हुनर को भी जगह देते हैं। यही तवाज़ुन इंसान को आगे बढ़ने में मदद देता है। हमारे नौजवानों के सामने भी इंटरनेट की शक्ल में एक बड़ी दुनिया मौजूद है। मुफ़्त ऑनलाइन कोर्स, बड़ी यूनिवर्सिटियों के लेक्चर, अंग्रेज़ी सीखने के ज़रिये, कंप्यूटर की तालीम, प्रोग्रामिंग, फ़ाइनेंस और साइंस की बुनियादी जानकारी हासिल करने के बेशुमार रास्ते मौजूद हैं।

यह ज़रूरी नहीं कि हर नौजवान साइंस पढ़े या इंजीनियर बने। कोई कारोबार में महारत हासिल कर सकता है, कोई खेती को आधुनिक बना सकता है, कोई बेहतर शिक्षक बन सकता है, कोई सरकारी मुलाज़मत की तैयारी कर सकता है और कोई अपने हुनर से कामयाब ताजिर बन सकता है।

मगर हर रास्ते के लिए सीखने की आदत, मेहनत का जज़्बा और अपने मुस्तक़बिल की फ़िक्र ज़रूरी है। अगर किसी नौजवान को न्यूटन के क़वानीन मालूम नहीं, तो वह आज से सीख सकता है। अगर उसे केप्लर के क़वानीन का इल्म नहीं, तो वह किताब खोल सकता है। लेकिन अगर उसे अपनी ज़िंदगी से गुज़रते हुए वक़्त का एहसास ही नहीं, तो सबसे पहले उसी एहसास को जगाने की ज़रूरत है।

3. यूनिवर्सिटी का नाम काफ़ी नहीं, इल्मी शख़्सियत भी होनी चाहिए

किसी यूनिवर्सिटी में दाख़िला हासिल कर लेना ज़िंदगी में तरक़्क़ी की तरफ़ एक क़दम हो सकता है, मगर यह अपने आप में इल्मी फ़तह नहीं है। डिग्री का होना और इल्म का होना दो मुख़्तलिफ़ बातें हैं। डिग्री किसी ख़ास तालीमी मरहले की तकमील का सबूत होती है, जबकि इल्म एक मुसलसल सफ़र है। यूनिवर्सिटी इंसान को सिर्फ़ इम्तिहान पास करने का मौक़ा नहीं देती; वह उसे अपनी सोच वसीअ करने, मुख़्तलिफ़ ख़यालात समझने, दलील के साथ बात करने और अपनी सलाहियतों को पहचानने का मौक़ा भी देती है।

लेकिन अगर कोई तालिब-ए-इल्म यूनिवर्सिटी की चारदीवारी में तो मौजूद हो, मगर उसकी दिलचस्पी का मरकज़ तालीम के बजाय दिखावा, बेवजह की धाक, दोस्तों के बीच रौब जमाना और सोशल मीडिया पर अपनी ख़ास छवि बनाना हो, तो उसे अपने आप से सवाल करना चाहिए कि वह आख़िर हासिल क्या कर रहा है। यूनिवर्सिटी में पढ़ना एक इम्कान है, कामयाबी की ज़मानत नहीं।

किसी के पास डिग्री हो सकती है, मगर हुनर कम हो सकता है। किसी के पास अच्छे नंबर हो सकते हैं, मगर मसाइल हल करने की सलाहियत कमज़ोर हो सकती है। किसी के पास बहुत-से दोस्त हो सकते हैं, मगर अपने मुस्तक़बिल का कोई वाज़ेह नक़्शा न हो सकता है।  इसी तरह कोई नौजवान औपचारिक तालीम में बहुत आगे न हो, मगर अपने हुनर, मेहनत, ईमानदारी और तजुर्बे से एक कामयाब ज़िंदगी बना सकता है।

इसलिए सवाल किसी ख़ास कॉलेज या यूनिवर्सिटी का नहीं, बल्कि उस रवैये का है जिसके तहत इंसान तालीम को महज़ एक रस्म समझने लगता है। अगर हम अपने गाँव के नौजवानों को बेहतर देखना चाहते हैं, तो हमें उनसे सिर्फ़ यह नहीं पूछना चाहिए कि वे कहाँ पढ़ते हैं। हमें यह भी पूछना चाहिए कि वे क्या सीख रहे हैं, किस हुनर में बेहतर हो रहे हैं, उनके अगले पाँच बरस का क्या मंसूबा है और वे अपने इल्म को अमल में किस तरह ला रहे हैं।

यही सवाल उन्हें अपनी ज़िंदगी को ज़्यादा संजीदगी से देखने पर आमादा कर सकते हैं।

4. गुंडई की रीलें

हमारे दौर में सोशल मीडिया ने इंसान को अपनी ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ पहलू दुनिया के सामने पेश करने का आसान ज़रिया दिया है। कोई अपने सफ़र की तस्वीरें साझा करता है, कोई अपनी कामयाबी का जश्न मनाता है, कोई शायरी लिखता है और कोई अपनी फ़नकारी का मुज़ाहिरा करता है। यह सब अपनी जगह ठीक है। लेकिन जब सोशल मीडिया पर रौब जमाने, धमकी भरे अंदाज़ अपनाने, गुंडई की नक़ल करने, लड़ाई-झगड़े की नुमाइश करने और ख़ौफ़ पैदा करने को मर्दानगी का निशान समझा जाने लगे, तो यह एक ग़लत सामाजिक तसव्वुर को मज़बूत करता है।

कुछ नौजवानों की रीलों में अगर सबसे ज़्यादा दिलचस्पी इसी बात की हो कि वे कितने दबंग, ख़तरनाक या बेख़ौफ़ नज़र आ सकते हैं, तो हमें मर्दानगी के अपने मफ़हूम पर भी ग़ौर करना चाहिए। क्या मर्दानगी का मतलब दूसरों को डराना है? क्या बहादुरी का मतलब अपनी ताक़त का दिखावा करना है? क्या किसी इंसान की इज़्ज़त इस बात से तय होनी चाहिए कि उससे कितने लोग डरते हैं?

मेरे ख़याल में अस्ल बहादुरी का ताल्लुक़ इंसान के ज़ब्त, किरदार और ज़िम्मेदारी से है। जो शख़्स अपने ग़ुस्से पर क़ाबू रख सके, कमज़ोर के साथ इंसाफ़ कर सके, ग़लती होने पर अपनी इस्लाह कर सके और मुश्किल हालात में भी सही फ़ैसला कर सके, वह किसी भी दिखावटी दबंग से ज़्यादा मज़बूत है। किसी की इज़्ज़त छीनकर हासिल किया गया रौब, इज़्ज़त नहीं होता। लोगों के दिलों में जगह बनाना और उनके दिलों में ख़ौफ़ पैदा करना दो अलग-अलग बातें हैं।

रील में दिखाई गई दबंगई कुछ पलों के लिए तवज्जोह हासिल कर सकती है। लेकिन अस्ल ज़िंदगी में इंसान का किरदार उसके रोज़मर्रा के अमल से पहचाना जाता है। उसकी ज़िम्मेदारी, उसकी ज़बान, दूसरों से मुआमला करने का तरीक़ा और मुश्किल वक़्त में उसका रवैया ही उसकी अस्ल पहचान बनते हैं।

सोशल मीडिया पर किसी की नुमाइश देखकर यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता कि वह इंसान अस्ल ज़िंदगी में कैसा है। मगर अगर कोई नौजवान लगातार इसी तर्ज़ को अपनी पहचान बनाना चाहता है, तो उसे सोचना चाहिए कि वह दूसरों के सामने अपनी कौन-सी तस्वीर पेश कर रहा है। दबंगई का दिखावा आसान है; मज़बूत किरदार की तामीर मुश्किल है। और ज़िंदगी में आख़िरकार क़ीमत उसी चीज़ की होती है जिसे इंसान मेहनत और अच्छे अमल से हासिल करता है।

5. जिस्म और दिखावे की तहज़ीब

जिस्मानी सेहत की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। जिम जाना, कसरत करना, अपनी ग़िज़ा का ख़याल रखना और जिस्म को चुस्त-दुरुस्त बनाना अच्छी आदतें हैं। एक सेहतमंद जिस्म इंसान को अपनी ज़िम्मेदारियाँ बेहतर तरीक़े से निभाने में मदद देता है। लेकिन जब कसरत का मक़सद सेहत के बजाय सिर्फ़ दूसरों को मुतअस्सिर करना, तस्वीरों में जिस्म दिखाना या दोस्तों के सामने अपनी बॉडी का रौब जमाना रह जाए, तो सवाल उसके मक़सद पर उठता है।

जिस्म की तामीर के साथ ज़ेहन की तामीर भी ज़रूरी है।

अगर कोई नौजवान रोज़ अपने जिस्म को बेहतर बनाने के लिए वक़्त निकाल सकता है, तो वह रोज़ आधा घंटा किसी किताब के लिए भी निकाल सकता है। अगर वह अपनी कसरत के दिनों और उठाए गए वज़न का हिसाब रख सकता है, तो वह अपने इल्मी मक़सद और रोज़ाना की तरक़्क़ी का हिसाब भी रख सकता है। अगर वह अपनी ख़ुराक पर तवज्जोह दे सकता है, तो अपने मुस्तक़बिल की ग़िज़ा यानी इल्म, हुनर और तजुर्बे पर भी तवज्जोह दे सकता है।

यहाँ सवाल जिम छोड़ने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम अपने जिस्म के लिए जितनी मेहनत करते हैं, अपने ज़ेहन के लिए भी उतनी मेहनत करने को तैयार हैं? हमारी मआशरत में जिस्मानी बनावट को लेकर बढ़ती दिलचस्पी के साथ-साथ बौद्धिक सलाहियतों, किताबों, तहक़ीक़ और इल्मी गुफ़्तगू को भी जगह मिलनी चाहिए।

एक नौजवान के बाज़ू मज़बूत हों, यह अच्छी बात है। मगर उसके फ़ैसले भी मज़बूत होने चाहिए। उसकी जिस्मानी ताक़त बढ़े, यह बेहतर है। लेकिन उसके अंदर ज़ब्त, सब्र और ज़िम्मेदारी की ताक़त भी बढ़नी चाहिए। वरना इंसान का बाहरी वजूद तो तराशा जा सकता है, मगर अंदर की ख़ाली जगह जस की तस रह जाती है।

6. स्क्रीन पर आबाद दुनिया और अस्ल ज़िंदगी की वीरानी

हमारे सामने आज एक अजीब मुआमला है। इंसान दुनिया भर की ख़बरें अपनी हथेली में रखता है, मगर कई बार अपने ही मुस्तक़बिल के बारे में संजीदगी से सोचने का वक़्त नहीं निकाल पाता। वह घंटों रीलें देख सकता है। किसी की ज़िंदगी, किसी की गाड़ी, किसी की बॉडी, किसी की मोहब्बत और किसी की लड़ाई पर अपनी राय क़ायम कर सकता है। वह दूसरों की ज़िंदगी के छोटे-छोटे लम्हों को देखकर अपना वक़्त ख़र्च कर सकता है। मगर जब बात अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने की आती है, तो अक्सर कहता है कि वक़्त नहीं मिलता। आख़िर यह कैसा तज़ाद है? क्या वक़्त की कमी है या तरजीहात की? क्या मौक़ों की कमी है या उन्हें इस्तेमाल करने के इरादे की? क्या सीखने के ज़रिये कम हैं या सीखने की आदत कमज़ोर पड़ चुकी है?

हर नौजवान पर एक जैसा इल्ज़ाम लगाना नाइंसाफ़ी होगी। किसी के घर के हालात मुश्किल हो सकते हैं, किसी पर रोज़गार का दबाव हो सकता है, कोई तालीमी कमज़ोरी से जूझ रहा हो सकता है और कोई अपने अंदर की किसी परेशानी का इज़हार न कर पा रहा हो। इसलिए हर शख़्स की ज़िंदगी को बाहर से देखकर उसके बारे में मुकम्मल फ़ैसला नहीं किया जा सकता।

मगर इन तमाम हक़ीक़तों के बावजूद एक बात अपनी जगह क़ायम रहती है: इंसान को अपने वक़्त और तवज्जोह की हिफ़ाज़त करना सीखना होगा।

सोशल मीडिया को इस्तेमाल करना चाहिए, उसका ग़ुलाम नहीं बनना चाहिए। मोबाइल को इल्म, हुनर और राब्ते का ज़रिया बनाना चाहिए, न कि अपनी तमाम तवज्जोह को क़ैद कर देने वाला ऐसा मरकज़, जहाँ से बाहर की दुनिया छोटी और स्क्रीन की दुनिया बड़ी होती चली जाए। जिस नौजवान के पास मोबाइल है, उसके पास किताब तक पहुँचने का ज़रिया भी हो सकता है। जिस नौजवान के पास इंटरनेट है, उसके सामने दुनिया के कई इल्मी दरवाज़े खुल सकते हैं। फ़र्क़ इस बात से पड़ेगा कि वह अपनी तवज्जोह किस चीज़ पर ख़र्च करता है।

7. किस मुस्तक़बिल की तामीर हो रही है?

अगर नौजवानी की सरगर्मियों का जायज़ा लिया जाए, तो कुछ और पहलू भी नज़रअंदाज़ नहीं किए जा सकते: हुक़्क़ा पीने की आदत, PUBG जैसे गेमों में घंटों मशग़ूल रहना, देहरादून और रुड़की के नाइट क्लबों में जाने पर पैसे ख़र्च करना और अपनी मआशी हैसियत से बढ़कर महँगे मोबाइल फ़ोन ख़रीदने का शौक़।

सवाल यह नहीं कि कोई शख़्स दोस्तों के साथ बाहर क्यों जाता है, मनोरंजन क्यों करता है या अपने लिए अच्छा मोबाइल क्यों ख़रीदता है। अस्ल सवाल यह है कि इन सरगर्मियों की हद क्या है और इनके मुक़ाबले में ज़िंदगी की बुनियादी ज़िम्मेदारियों को कितनी अहमियत दी जा रही है? अगर किसी घर की आमदनी महदूद हो, घर के ख़र्च मुश्किल से पूरे होते हों और तालीम या रोज़गार के लिए पैसे की ज़रूरत हो, लेकिन उसी घर का नौजवान महँगे फ़ोन, नाइट क्लबों, हुक़्क़े और बेवजह की मशग़ूलियतों पर अपनी दौलत ख़र्च कर रहा हो, तो यह सिर्फ़ शौक़ का मामला नहीं रहता। यह मआशी शुऊर और ज़िम्मेदारी का मामला बन जाता है।

जिस घर में आटे का हिसाब लगाकर महीने का राशन ख़रीदा जाता हो, वहाँ अगर कोई नौजवान अपनी हैसियत से बढ़कर फ़ोन ख़रीदने या महफ़िलों में अपनी शान दिखाने पर तुला हो, तो उसे अपने आप से पूछना चाहिए कि वह किसे मुतअस्सिर करने की कोशिश कर रहा है और किस क़ीमत पर? क्या कुछ लोगों की निगाहों में बेहतर दिखाई देने के लिए अपने घर की मआशी परेशानियों को नज़रअंदाज़ कर देना दानिशमंदी है? क्या महँगा मोबाइल किसी इंसान की सलाहियत का पैमाना है? क्या नाइट क्लबों में ख़र्च की गई रक़म, हुक़्क़े के धुएँ और गेमिंग में गुज़ारे गए घंटों से मुस्तक़बिल की कोई मज़बूत बुनियाद तैयार होती है?

मनोरंजन की अपनी जगह है, मगर जब उस पर ख़र्च किया गया वक़्त और पैसा तालीम, हुनर, रोज़गार और घर की ज़रूरतों पर भारी पड़ने लगे, तो इंसान को अपनी तरजीहात बदलने की ज़रूरत होती है।

हुक़्क़े को महज़ फ़ैशन समझना भी दुरुस्त नहीं। तंबाकू वाला हुक़्क़ा सेहत के लिए नुक़सानदेह है। इसी तरह ऑनलाइन गेमिंग में हद से ज़्यादा वक़्त ख़र्च करना पढ़ाई, नींद और रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों को मुतअस्सिर कर सकता है। जब ये चीज़ें इंसान की शख़्सियत का मरकज़ बन जाएँ, तो वह उस इल्मी और पेशेवर तरक़्क़ी से दूर हो सकता है जिसकी उसे आगे चलकर सख़्त ज़रूरत होगी।

महँगा फ़ोन और ख़ाली जेब: दिखावे की मआशियात

आज हमारे समाज में एक अजीब-सी दौड़ दिखाई देती है। जेब में पैसे हों या न हों, मगर हाथ में महँगा फ़ोन होना चाहिए। आमदनी कितनी है, इससे ज़्यादा अहम यह समझा जाने लगा है कि दूसरों के सामने हमारी हैसियत कैसी दिखाई देती है। यह मिज़ाज नौजवानों के लिए ख़ास तौर पर नुक़सानदेह हो सकता है। इसकी वजह यह है कि जवानी में इंसान अपनी अस्ल सलाहियतों और मुस्तक़बिल की तामीर पर तवज्जोह देने के बजाय अपनी सामाजिक छवि बनाने में उलझ सकता है।

मगर हक़ीक़त यह है कि मोबाइल की क़ीमत और इंसान की क़ीमत दो अलग-अलग चीज़ें हैं। महँगा फ़ोन रखने वाला हर शख़्स कामयाब नहीं होता और सादा फ़ोन इस्तेमाल करने वाला हर इंसान नाकाम नहीं होता। किसी नौजवान की अस्ल हैसियत का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि वह क्या जानता है, क्या कर सकता है, अपनी ज़िम्मेदारियाँ किस तरह निभाता है और मुश्किल वक़्त में अपने लिए कौन-सा रास्ता निकालता है।

दिखावे की मआशियात में इंसान दूसरों को अपनी ख़ुशहाली दिखाने के लिए ख़र्च करता है, जबकि हक़ीक़ी मआशियात में वह अपनी आमदनी बढ़ाने, ख़र्च समझने, बचत करने और अपनी सलाहियतों में इज़ाफ़ा करने की कोशिश करता है। हमारे नौजवानों को यह फ़र्क़ समझना होगा। ज़िंदगी में अच्छी चीज़ें हासिल करना बुरा नहीं, मगर उसके लिए पहले अपनी बुनियाद मज़बूत करना ज़रूरी है।

8. डिग्री के बाद आख़िर रास्ता कहाँ है?

मेरी फ़िक्र का एक और सबब है। मेरी जानकारी के मुताबिक़, इससे पहले हमारे गाँव के पाँच नौजवान रुड़की के कॉलेजों से बीटेक की डिग्री हासिल कर चुके हैं। उनकी मौजूदा पेशेवर स्थिति के बारे में जो जानकारी मुझे है, उसके मुताबिक़ उनमें से ज़्यादातर या तो कम तनख़्वाह पर काम कर रहे हैं, या रोज़गार के मामले में अब तक अपनी मंज़िल हासिल नहीं कर पाए हैं, या फिर अपनी पेशेवर ज़िंदगी को लेकर ऐसी अपेक्षाएँ रखते हैं जिनके साथ उनकी मौजूदा तैयारी का तवाज़ुन नज़र नहीं आता।

यहाँ एक बात साफ़ करना ज़रूरी है: कम तनख़्वाह पर काम करना किसी इंसान की तौहीन नहीं। रोज़गार तलाश करना, शुरुआती दौर में कम आमदनी पर काम करना और तजुर्बा हासिल करने के लिए मेहनत करना कोई शर्म की बात नहीं है। बहुत-से कामयाब लोगों ने अपनी पेशेवर ज़िंदगी का आग़ाज़ मामूली तनख़्वाह से किया है।

मेरी फ़िक्र कम तनख़्वाह नहीं, बल्कि उस रवैये से है जिसमें इंसान अपनी मौजूदा सलाहियतों को बेहतर बनाने की मेहनत किए बग़ैर बड़ी तनख़्वाह की उम्मीद तो रखता है, मगर शुरुआती मौक़ों को सिर्फ़ इसलिए ठुकरा देता है कि उनसे उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ आमदनी नहीं हो रही।

अगर किसी नौजवान का ख़्वाब एक लाख रुपये महीने की नौकरी हासिल करना है, तो उसे यह ख़्वाब ज़रूर देखना चाहिए। बड़े ख़्वाब देखने में कोई बुराई नहीं। मगर सवाल यह है कि क्या उसने अपने ख़्वाब के मुताबिक़ अपनी सलाहियतें भी तैयार की हैं? क्या उसे अपने मैदान का मुकम्मल इल्म है? क्या उसके पास ऐसा हुनर है जिसकी बाज़ार में माँग हो? क्या वह इंटरव्यू में अपनी क़ाबिलियत साबित कर सकता है? क्या उसे अंग्रेज़ी, कंप्यूटर, पेशेवर गुफ़्तगू और अपने काम की अमली समझ हासिल है? क्या वह कम आमदनी से आग़ाज़ करके तजुर्बा हासिल करने और धीरे-धीरे आगे बढ़ने के लिए तैयार है?

अगर इन सवालों के जवाब नकारात्मक हैं, तो सिर्फ़ एक लाख रुपये की तनख़्वाह की ख़्वाहिश से वह तनख़्वाह हासिल नहीं हो जाएगी।

ख़्वाब जितना बुलंद हो, उसकी तामीर के लिए मेहनत, महारत और सब्र भी उतना ही बुलंद होना चाहिए।

किसी नौजवान को एक लाख रुपये महीने की नौकरी चाहिए, तो उसे ऐसी नौकरी के लिए कोशिश करने का पूरा हक़ है। लेकिन अगर वह एक लाख से कम तनख़्वाह पर काम करने के लिए बिल्कुल तैयार न हो, जबकि उसके पास न पर्याप्त तजुर्बा हो, न कोई ख़ास महारत और न ही रोज़गार का दूसरा ज़रिया, तो उसे अपनी रणनीति पर दोबारा ग़ौर करना चाहिए।

कई बार छोटी नौकरी सिर्फ़ नौकरी नहीं होती; वह पेशेवर दुनिया में दाख़िले का दरवाज़ा होती है। वहाँ से इंसान काम सीखता है, लोगों से ताल्लुक़ात बनाता है, अपनी कमज़ोरियों को पहचानता है और आगे बढ़ने की बुनियाद तैयार करता है। हाँ, अगर कोई नौकरी इंसान का नाजायज़ इस्तेहसाल करती हो, उसकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी न करती हो या उसके सामने बेहतर रास्ते मौजूद हों, तो उसे आँख बंद करके क़ुबूल करना भी ज़रूरी नहीं। मगर हर मौक़े को सिर्फ़ शुरुआती तनख़्वाह की वजह से ठुकरा देना भी समझदारी नहीं।

कारोबार छोटा हो सकता है, मगर सोच छोटी नहीं होनी चाहिए, अगर किसी नौजवान को नौकरी नहीं करनी और वह अपना कारोबार शुरू करना चाहता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं। बल्कि कारोबार, ख़ुदरोज़गारी और उद्यमिता नौजवानों के लिए बेहतरीन रास्ते हो सकते हैं। मगर कारोबार सिर्फ़ यह कह देने से शुरू नहीं हो जाता कि मुझे नौकरी नहीं करनी। उसके लिए बाज़ार को समझना, पूँजी का इंतज़ाम करना, ग्राहकों की ज़रूरत पहचानना, आमदनी और ख़र्च का हिसाब रखना और नुक़सान के इम्कान को समझना पड़ता है।

कारोबार धीरे-धीरे परवान चढ़ता है। शुरुआत में मुनाफ़ा कम हो सकता है, कभी नुक़सान भी हो सकता है और कई बार अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। जो शख़्स मेहनत, सब्र और सीखने की आदत के साथ काम करता है, उसके लिए आगे बढ़ने के इम्कान पैदा हो सकते हैं।

इसलिए अगर कोई नौजवान कारोबार करना चाहता है, तो उसे नौकरी करने वालों से कमतर नहीं समझना चाहिए। इसी तरह नौकरी करने वाले को भी सिर्फ़ इसलिए कमतर नहीं समझना चाहिए कि वह अपना कारोबार नहीं करता। अस्ल फ़र्क़ नौकरी और कारोबार का नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार और ग़ैर-ज़िम्मेदार रवैये का है।

अगर किसी नौजवान के पास कारोबार का मंसूबा है, तो उसे उस पर अमल करना चाहिए। अगर उसके पास पूँजी नहीं, तो छोटे पैमाने से आग़ाज़ करने, बाज़ार का तजुर्बा हासिल करने और कारोबार के उसूल सीखने की कोशिश करनी चाहिए। अगर उसे अभी कोई रास्ता साफ़ दिखाई नहीं देता, तो उसे वक़्त ज़ाया करने के बजाय अपनी सलाहियतें बढ़ानी चाहिए।

मगर सिर्फ़ इसलिए घर पर बैठे रहना कि कोई एक लाख रुपये की नौकरी नहीं दे रहा, न कारोबार है और न ही मुस्तक़बिल की तामीर।

घर पर बैठकर रोटी खाना आसान है, मगर घर की ज़िम्मेदारी उठाना मुश्किल

सबसे ज़्यादा फ़िक्र की बात वह सूरत है जब कोई नौजवान अपनी पढ़ाई मुकम्मल करने के बाद भी अपने मुस्तक़बिल के लिए कोई वाज़ेह क़दम नहीं उठाता। न वह किसी हुनर में महारत हासिल करने की कोशिश करता है, न रोज़गार के लिए संजीदा जद्दोजहद करता है, न कारोबार का कोई अमली मंसूबा बनाता है और न ही अपनी कमज़ोरियों को दूर करने के लिए तैयार होता है। ऐसी सूरत में इंसान को अपने आप से एक सीधा सवाल करना चाहिए: आख़िर मेरी ज़िंदगी की ज़िम्मेदारी कौन उठाएगा?

वालिदैन ने अपनी हैसियत के मुताबिक़ तालीम दिलाई, घर के ख़र्च उठाए और यह उम्मीद की कि बेटा बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़ा होगा, अपने लिए बेहतर ज़िंदगी बनाएगा और ज़रूरत पड़ने पर घर का सहारा भी बनेगा। अगर इसके बाद भी नौजवान अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़कर घर पर बैठा रहे, तो उसे अपने रवैये पर ग़ौर करना चाहिए।

यहाँ भी हर बेरोज़गार नौजवान को एक ही नज़र से देखना ठीक नहीं। किसी को नौकरी नहीं मिल रही हो सकती है, कोई अपनी सेहत या पारिवारिक हालात से जूझ रहा हो सकता है और कोई लगातार कोशिश के बावजूद नाकाम हो रहा हो सकता है। बेरोज़गारी हमेशा आलस का नतीजा नहीं होती।

मगर जो शख़्स काम करने की सलाहियत रखता हो, उसके सामने मौक़े मौजूद हों और फिर भी वह सिर्फ़ अपनी पसंदीदा तनख़्वाह या मनचाही शान के इंतज़ार में हर कोशिश से गुरेज़ करे, उसे अपने फ़ैसलों का मुहासबा करना चाहिए।

रोटी का एक टुकड़ा सिर्फ़ भूख मिटाने की चीज़ नहीं; वह मेहनत, ज़िम्मेदारी और इंसानी वक़ार से भी जुड़ा हुआ है। इंसान की इज़्ज़त इस बात में नहीं कि वह हर हाल में दूसरों के सहारे रहे, बल्कि इस बात में है कि वह अपनी सलाहियत के मुताबिक़ कोशिश करे और अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी उठाए।

कम कमाना शर्म की बात नहीं; मगर अपनी सलाहियतों को बेहतर बनाने की कोशिश से ही दस्तबरदार हो जाना ज़रूर सोचने की बात है।

डिग्री हासिल करना मंज़िल नहीं, एक नए सफ़र का आग़ाज़ है. बीटेक की डिग्री अपने आप में एक इल्मी मरहला है। लेकिन डिग्री के बाद पेशेवर कामयाबी हासिल करने के लिए सिर्फ़ सर्टिफ़िकेट काफ़ी नहीं होता। इंजीनियरिंग में अमली महारत, सॉफ़्टवेयर और तकनीकी औज़ारों की समझ, प्रोजेक्ट पर काम करने का तजुर्बा, पेशेवर गुफ़्तगू और मुसलसल सीखने की आदत भी ज़रूरी होती है।

अगर कोई नौजवान डिग्री के बाद यह समझ ले कि अब उसे सीधे ऊँची तनख़्वाह मिलनी चाहिए, तो वह पेशेवर दुनिया की हक़ीक़त को ठीक से नहीं समझ रहा। उसे यह समझना होगा कि डिग्री ने उसके लिए एक दरवाज़ा खोला है; उस दरवाज़े से आगे बढ़ना उसे अपनी मेहनत से है। हमारे गाँव के पहले पाँच  बीटेक करने वाले नौजवानों का तजुर्बा आने वाली नस्ल के लिए सबक़ बन सकता है। उनकी ज़िंदगी को नाकामी का तमग़ा लगाने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए देखना चाहिए कि तालीम से रोज़गार तक का सफ़र कहाँ मुश्किल हुआ, किन सलाहियतों की कमी महसूस हुई और आगे आने वाले नौजवान उन मुश्किलात से क्या सीख सकते हैं।

अगर हम इस तजुर्बे से सीखकर अपने गाँव के अगले नौजवानों को बेहतर रहनुमाई दे सकें, तो पिछली मुश्किलात भी आने वाली नस्ल के लिए इल्म का ज़रिया बन सकती हैं।

आख़िर मक़सद किसी को शर्मिंदा करना नहीं, बल्कि यह यक़ीनी बनाने की कोशिश करना होना चाहिए कि अगली नस्ल सिर्फ़ डिग्रियाँ हासिल न करे, बल्कि उन डिग्रियों को अपनी पेशेवर ज़िंदगी में कामयाबी की बुनियाद बनाने के लिए भी तैयार हो।

कामयाबी की अस्ल बुनियाद सिर्फ़ डिग्री नहीं, बल्कि डिग्री के साथ हुनर, हुनर के साथ मेहनत और मेहनत के साथ इस्तिक़ामत है।

— तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

 

यह तहरीर तन्क़ीद बराए तन्क़ीद नहीं, बल्कि अपने लोगों की बेहतरी की एक ख़्वाहिश है। मेरी दुआ है कि बनहेरा टांडा का हर नौजवान अपनी ज़िंदगी में कामयाबी हासिल करे, अपने वालिदैन का नाम रौशन करे और अपनी सलाहियतों से समाज के लिए ख़ैर का सबब बने।

 

इस आर्टिकल का दूसरा पार्ट जल्द ही पब्लिश कर दिया जाएगा।

 

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