पायल भटनागर की वायरल ग़ज़ल का अरूज़ी जायज़ा | वज़्न, बहर और तक़्तीअ की पड़ताल | Payal Bhatnagar | Tariq Azeem Tanha
वायरल ग़ज़ल बनाम फ़न्न-ए-शायरी: पायल भटनागर की ग़ज़ल का वज़्न और अरकान की कसौटी पर जायज़ा
क्या किसी ग़ज़ल का लोकप्रिय हो जाना उसके फ़न्नी ऐबों को भी ख़ूबी में बदल देता है? क्या दिल को छू लेने वाले अशआर के लिए बहर की पाबंदी से आज़ादी ली जा सकती है? और क्या किसी शेर की मक़बूलियत ही उसकी शायरी होने की सबसे बड़ी दलील है?
सोशल मीडिया के इस दौर में शायरी की दुनिया पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा वसीअ हो गई है। अब किसी शायर को अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए किसी बड़े मुशायरे, अदबी रिसाले या नामवर शायर की ताईद का मोहताज नहीं रहना पड़ता। एक वीडियो, एक अच्छी आवाज़, दिल को छू लेने वाला मिसरा और मुनासिब संगीत, कभी-कभी इतना ही किसी कलाम को लाखों लोगों तक पहुँचाने के लिए काफ़ी होता है।
मगर इस नई दुनिया में एक सवाल अपनी पूरी अहमियत के साथ मौजूद है: क्या किसी कलाम का वायरल होना और उसका फ़न्नी तौर पर मुकम्मल होना एक ही बात है?
इसी सवाल के हवाले से पायल भटनागर जी की इन दिनों चर्चा में रहने वाली ग़ज़ल का जायज़ा लेना दिलचस्प होगा। उनकी ग़ज़ल के कुछ अशआर ज़िंदगी, मौत, यादों, मोहब्बत और इंसानी तन्हाई जैसे मौज़ूआत को छूते हैं। इन ख़यालात में एक ऐसी सादगी है जिससे आम पाठक भी आसानी से जुड़ सकता है। लेकिन जब इसी कलाम को ग़ज़ल के इल्म-ए-अरूज़, यानी बहर, वज़्न और अरकान की कसौटी पर परखा जाता है, तो कुछ अहम सवाल सामने आते हैं।
यहाँ हमारा मक़सद किसी शख़्स की मक़बूलियत को कम करना नहीं, बल्कि उस फ़र्क़ को समझना है जो एक दिलनशीं ख़याल और एक फ़न्नी तौर पर पुख़्ता ग़ज़ल के दरमियान मौजूद होता है।
क्योंकि शायरी में ख़याल की ख़ूबसूरती अपनी जगह है और फ़न्न की पाबंदी अपनी जगह।
1. पहले ग़ज़ल को पढ़िए, फिर उसकी बहर को समझिए
पायल भटनागर जी की ग़ज़ल के अशआर कुछ इस तरह हैं:
कितने बदन को छोड़ के पाई है ज़िन्दगी,
अपनी नहीं है दोस्त पराई है ज़िन्दगी।
देखा है कभी आपने मंज़र वो मौत का,
ऐसे किसी मक़ाम पे लाई है ज़िन्दगी।
फूलों से चाँद तारों से रंगों से मेरी जाँ,
तेरे ही वास्ते तो सजाई है ज़िन्दगी।
हँसते हुए दिखाये हैं किरदार सभी के,
तस्वीर में तो अच्छी बनाई है आपने।
अपना नहीं था कोई भी जिस वक़्त मेरे पास,
यादों के साथ-साथ बिताई है ज़िन्दगी।
इन अशआर में ज़िंदगी को एक ऐसी चीज़ के तौर पर पेश किया गया है जो इंसान की अपनी होकर भी पूरी तरह उसकी नहीं है। कहीं मौत का मंज़र है, कहीं मोहब्बत के लिए सजाई गई दुनिया, कहीं तस्वीर और किरदारों का तज़ाद है और कहीं तन्हाई में यादों का सहारा।
इन विषयों में शायरी की गुंजाइश मौजूद है। कुछ मिसरों में ऐसा ख़याल भी है जो पाठक को ठहरकर सोचने पर मजबूर कर सकता है।
लेकिन ग़ज़ल का फ़न्न सिर्फ़ ख़यालात को ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ में बयान कर देने का नाम नहीं है। ग़ज़ल की अपनी एक तामीर है, अपना एक आहंग है, अपनी एक लय है और उस लय को बरक़रार रखने के लिए अरूज़ के कुछ उसूल हैं।
यहीं से इस ग़ज़ल का असल फ़न्नी जायज़ा शुरू होता है।
2. ग़ज़ल का वज़्न और अरकान क्या होते हैं?
ग़ज़ल की बुनियादी ख़ूबियों में से एक उसकी बहर है। बहर को आसान ज़बान में समझें तो यह शेर की वह लयबद्ध संरचना है जिसके मुताबिक़ उसके दोनों मिसरे कहे जाते हैं।
जिस तरह मौसीक़ी में सुरों और ताल का अपना निज़ाम होता है, उसी तरह ग़ज़ल में भी हिज्जों के वज़्न और अरकान का एक तयशुदा निज़ाम होता है। कोई मिसरा पढ़ते हुए अगर उसकी लय तयशुदा बहर से हट जाए, तो अरूज़ की ज़बान में उसे वज़्न का टूटना कहा जा सकता है।
इस सिलसिले में तीन बातें समझना ज़रूरी हैं।
पहली बात: हिज्जे का वज़्न। किसी लफ़्ज़ को बोलते वक़्त उसके हिज्जों की बनावट और अदायगी यह तय करती है कि तक़्तीअ में उसे किस तरह गिना जाएगा।
दूसरी बात: अरकान। बहर के भीतर वज़्न की जो तयशुदा इकाइयाँ होती हैं, उन्हें अरकान कहा जाता है। मिसरे की तक़्तीअ करते हुए इन्हीं इकाइयों के मुताबिक़ उसके वज़्न को परखा जाता है।
तीसरी बात: बहर की पाबंदी। ग़ज़ल के सभी अशआर को एक ही बहर के मुताबिक़ होना चाहिए। किसी एक मिसरे में वज़्न का बिगड़ना भी ग़ज़ल की फ़न्नी बनावट पर सवाल खड़ा कर सकता है।
यानी यह मुमकिन है कि कोई मिसरा ख़याल के लिहाज़ से अच्छा हो, सुनने में ख़ूबसूरत लगे और फिर भी अपनी मुक़र्रर बहर पर पूरा न उतरे।
यही वह बुनियादी फ़र्क़ है जिसे समझे बग़ैर ग़ज़ल की आलोचना अधूरी रहती है।
3. इस ग़ज़ल की बहर: 221 2121 1221 212
इस ग़ज़ल के लिए जिस वज़्न का दावा किया जा रहा है, वह है:
221 2121 1221 212
अरकान की ज़बान में इस बहर को यूँ बयान किया जाता है:
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
यहाँ एक अहम उसूल याद रखना चाहिए: बहर का नाम बता देना और पूरी ग़ज़ल का उस बहर पर सही उतरना दो अलग बातें हैं। किसी कलाम की बहर निर्धारित कर देने के बाद हर मिसरे की तक़्तीअ करके यह देखना ज़रूरी होता है कि उसके हिज्जे उसी वज़्न की पैरवी कर रहे हैं या नहीं।
अगर किसी मिसरे में एक जगह भी ऐसा हिज्जा आ जाए जिसका वज़्न मुक़र्रर अरकान से मेल न खाता हो, तो उस मिसरे की दोबारा जाँच ज़रूरी हो जाती है।
इसी उसूल को सामने रखकर अब ग़ज़ल के कुछ मिसरों पर ग़ौर करते हैं।
4. मतले की बात: अच्छी शुरुआत, मगर आगे भी वही पाबंदी ज़रूरी है
कितने बदन को छोड़ के पाई है ज़िन्दगी,
अपनी नहीं है दोस्त पराई है ज़िन्दगी।
मतला ग़ज़ल का पहला शेर होता है और इसकी ख़ास अहमियत है, क्योंकि यहीं से ग़ज़ल की बहर, क़ाफ़िये और रदीफ़ का निज़ाम सामने आता है।
इस मतले में ज़िंदगी को पराई कहने का ख़याल एक तअज्जुब पैदा करता है। इंसान ज़िंदगी को अपनी समझता है, लेकिन शायर कहता है कि यह उसकी अपनी नहीं, बल्कि पराई है। पहले मिसरे में कितने बदन छोड़कर ज़िंदगी हासिल करने की बात एक और सवाल पैदा करती है, क्या ज़िंदगी सिर्फ़ एक वजूद का नाम है या इसके पीछे कई तजुर्बों, कई फ़नाओं और कई वजूदों की दास्तान भी छिपी है?
ख़याल की इस गुंजाइश को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
इस मतले को बहर के लिहाज़ से पहली नज़र में स्वीकार कर लेने के बावजूद यह भी ज़रूरी है कि दोनों मिसरों की मुकम्मल तक़्तीअ की जाए। किसी एक मिसरे का सुनने में ठीक लगना अपने आप में पूरी बहर की तस्दीक़ नहीं है।
यहाँ एक बुनियादी बात समझने की है: मतले का ठीक होना पूरी ग़ज़ल के ठीक होने की गारंटी नहीं देता। हर शेर को अपनी जगह उसी बहर की पाबंदी निभानी होती है।
5. दूसरा शेर: 'देखा है कभी आपने मंज़र वो मौत का'
देखा है कभी आपने मंज़र वो मौत का,
ऐसे किसी मक़ाम पे लाई है ज़िन्दगी।
इस शेर का पहला मिसरा हमारी आलोचना का सबसे अहम हिस्सा है।
देखा है कभी आपने मंज़र वो मौत का
इस मिसरे में 'देखा है' तक वज़्न की अदायगी को दुरुस्त मानते हुए अगला लफ़्ज़ 'कभी' ध्यान खींचता है।
यहाँ मसला केवल लफ़्ज़ 'कभी' का नहीं, बल्कि उसकी तक़्तीअ में इस्तेमाल होने वाले वज़्न का है। इस ग़ज़ल के निर्धारित वज़्न के मुताबिक़ जिस जगह 'कभी' को बैठाया जा रहा है, वहाँ उसके वज़्न को 2 लिया गया है; जबकि यहाँ पेश किए गए अरूज़ी हिसाब में 'कभी' का वज़्न 12 बनता है।
अगर तक़्तीअ में यह हिसाब सही साबित होता है, तो मिसरे के उस हिस्से का वज़्न तयशुदा अरकान से मेल नहीं खाता।
यही वह जगह है जहाँ ग़ज़ल की लय और अरूज़ी पाबंदी के दरमियान फ़र्क़ सामने आता है। आम बातचीत में 'कभी' एक मामूली-सा लफ़्ज़ है। सुनने वाला उसे बिना किसी परेशानी के पढ़ भी लेता है। मगर अरूज़ में किसी लफ़्ज़ की अहमियत सिर्फ़ उसके मानी तक महदूद नहीं रहती; यह भी देखना पड़ता है कि वह अपनी जगह किस वज़्न के साथ बैठ रहा है।
किसी मिसरे को पढ़ते हुए अगर हम अपनी सहूलत के मुताबिक़ किसी लफ़्ज़ को खींच दें, दबा दें या उसकी अदायगी बदल दें, तो मुमकिन है कि सुनने में लय पैदा हो जाए। मगर यह लय अपने आप में बहर की दुरुस्ती का सबूत नहीं है।
ग़ज़ल में फ़न्न की असल ख़ूबी यह है कि शायर अल्फ़ाज़ की ऐसी तरतीब तलाश करे जिसमें ख़याल भी बाक़ी रहे और वज़्न भी सलामत रहे।
इसलिए इस मिसरे पर एतराज़ की बुनियाद ख़याल नहीं, बल्कि उसकी अरूज़ी बनावट है। इसे सही या ग़लत क़रार देने से पहले मुकम्मल तक़्तीअ और लफ़्ज़ों की अदायगी का हिसाब पेश करना चाहिए; लेकिन अगर 'कभी' को 2 मानकर ही मिसरे को बहर में बैठाया जा रहा है और उसका वास्तविक वज़्न 12 निकलता है, तो यह एक गंभीर फ़न्नी सवाल है और हक़ीक़त में भी यह मिसरा बहर से ख़ारिज है।
6. 'हँसते हुए दिखाये हैं किरदार सभी के' — आख़िरी रुक्न का सवाल
हँसते हुए दिखाये हैं किरदार सभी के,
तस्वीर में तो अच्छी बनाई है आपने।
यहाँ दूसरा अहम मसला सामने आता है।
पहले मिसरे का आख़िरी हिस्सा है:
किरदार सभी के
इस ग़ज़ल के निर्धारित वज़्न में आख़िरी रुक्न का हिसाब 212 है। मगर जिस तक़्तीअ की तरफ़ इशारा किया जा रहा है, उसमें 'सभी के' का वज़्न 122 बन रहा है।
यहीं सवाल पैदा होता है कि क्या मिसरे का यह हिस्सा आख़िरी रुक्न की ज़रूरत पूरी कर रहा है?
अगर तक़्तीअ में वाक़ई आख़िरी हिस्से का वज़्न 122 निकलता है और उसे 212 के मुक़ाबले में बिना किसी जायज़ अरूज़ी गुंजाइश के रखा गया है, तो यह बहर की पाबंदी के लिहाज़ से एतराज़ की वजह बन सकता है।
यहाँ एक बारीक बात भी समझने की है। अरूज़ में केवल अंकों को देखकर फ़ैसला नहीं किया जाता; हिज्जों की असल अदायगी, वस्ल, वक़्फ़ और संबंधित बहर में मान्य बदलावों को भी देखा जाता है। इसीलिए तक़्तीअ करते वक़्त यह बताना ज़रूरी है कि किस लफ़्ज़ का कौन-सा हिज्जा किस रुक्न में जा रहा है।
लेकिन अगर मुकम्मल तक़्तीअ के बाद भी आख़िरी रुक्न का वज़्न निर्धारित बहर से अलग निकलता है, तो सिर्फ़ इसलिए उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि मिसरा सुनने में अच्छा लगता है।
ग़ज़ल की खूबी यही है कि ख़याल और लय एक-दूसरे के मुक़ाबिल नहीं, बल्कि एक-दूसरे के मददगार होते हैं।
7. क्या अच्छा ख़याल बहर की कमी पूरी कर सकता है?
यह सवाल हर उस शख़्स के लिए अहम है जो ग़ज़ल पढ़ता है, सुनता है या कहने की कोशिश करता है।
मान लीजिए किसी शायर ने एक ऐसा शेर कहा जो आपकी ज़िंदगी के किसी तजुर्बे को बयान करता है। आप उसे सुनकर मुतास्सिर हो जाते हैं। उसके अल्फ़ाज़ आपको अपने किसी पुराने रिश्ते, किसी अधूरी ख़्वाहिश या किसी बिछड़े हुए शख़्स की याद दिलाते हैं।
क्या उस शेर की यह असर-अंगेज़ी बेकार हो जाती है अगर उसमें वज़्न की कमी निकल आए?
हरगिज़ नहीं।
उसका जज़्बाती असर अपनी जगह मौजूद रह सकता है। पाठक उससे जुड़ सकता है। सुनने वाला उसे याद रख सकता है। मगर इस असर-अंगेज़ी से उसकी अरूज़ी दुरुस्ती साबित नहीं होती।
यहाँ दो अलग पैमानों को समझना होगा:
- जज़्बाती पैमाना: क्या कलाम दिल को छूता है? क्या उसमें कोई ऐसा ख़याल है जिससे पाठक जुड़ सके?
- फ़न्नी पैमाना: क्या कलाम अपनी चुनी हुई बहर, अरकान, क़ाफ़िये और रदीफ़ की पाबंदी करता है?
एक ग़ज़ल पहले पैमाने पर असरदार और दूसरे पैमाने पर कमज़ोर हो सकती है। इसके उलट कोई कलाम अरूज़ी तौर पर दुरुस्त होने के बावजूद ख़याल और तख़य्युल के लिहाज़ से मामूली भी हो सकता है।
बेहतरीन ग़ज़ल वह है जिसमें दोनों खूबियाँ एक साथ मौजूद हों।
इसलिए किसी कलाम की आलोचना करते वक़्त यह कहना कि 'मुझे यह शेर पसंद नहीं आया' और यह कहना कि 'इस मिसरे का वज़्न टूट रहा है' दो बिल्कुल अलग बातें हैं। पहली ज़ौक़ का मामला है; दूसरी फ़न्न और तक़्तीअ का।
8. 'फूलों से चाँद तारों से रंगों से मेरी जाँ' — तख़य्युल और तरतीब
फूलों से चाँद तारों से रंगों से मेरी जाँ,
तेरे ही वास्ते तो सजाई है ज़िन्दगी।
इस शेर में मोहब्बत को ज़िंदगी की सजावट का सबब बताया गया है। फूल, चाँद, सितारे और रंग, ये सब ऐसे इस्तिआरे हैं जिनका इस्तेमाल शायरी में लंबे अरसे से होता आया है।
यहाँ असल सवाल यह नहीं कि इन अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल पहले भी हुआ है या नहीं। शायरी की कोई भी ज़बान अपने पुराने इस्तिआरों से पूरी तरह आज़ाद नहीं हो सकती। सवाल यह है कि शायर उन इस्तिआरों को किस नए एहसास, किस नई तरतीब और किस नए मानी के साथ पेश करता है।
'तेरे ही वास्ते तो सजाई है ज़िंदगी' में एक सीधी और आसानी से समझ आने वाली मोहब्बत का इज़हार है। आम पाठक के लिए इसकी कशिश साफ़ है।
मगर फ़न्नी जायज़े में यहाँ भी वही उसूल लागू होता है: ख़याल अपनी जगह, बहर अपनी जगह। इस शेर की तक़्तीअ भी उसी निर्धारित वज़्न के मुताबिक़ की जानी चाहिए। सिर्फ़ इसलिए कि मिसरा रवानी से पढ़ा जा रहा है, उसे अरूज़ी तौर पर दुरुस्त नहीं मान लेना चाहिए।
यही ग़ज़ल की पढ़ाई और सिर्फ़ ग़ज़ल सुनने के दरमियान फ़र्क़ है।
9. 'तस्वीर में तो अच्छी बनाई है आपने' — लफ़्ज़ों के पीछे छिपा तज़ाद
इस शेर में तस्वीर और किरदारों का हवाला दिलचस्प है। तस्वीर में सब कुछ अच्छा दिखाई दे सकता है, जबकि असल ज़िंदगी में किरदारों की हक़ीक़त कुछ और हो सकती है।
यहाँ एक तज़ाद की गुंजाइश मौजूद है: दिखाई देने वाली दुनिया और वास्तविक दुनिया का फ़र्क़।
मगर शेर की फ़न्नी बनावट में कुछ सवाल उठते हैं। पहला मिसरा 'हँसते हुए दिखाये हैं किरदार सभी के' और दूसरा मिसरा 'तस्वीर में तो अच्छी बनाई है आपने' इन दोनों के दरमियान मानी का रिश्ता किस हद तक साफ़ है? 'आपने' किस शख़्स या किस ताक़त की तरफ़ इशारा करता है? तस्वीर किसने बनाई और उसमें किरदारों को हँसते हुए क्यों दिखाया गया?
इन सवालों के एक से ज़्यादा जवाब हो सकते हैं। शायरी में इबहाम यानी मानी की गुंजाइश अपने आप में ऐब नहीं है। कई बार यही इबहाम शेर को गहराई देता है। मगर जब इशारा इतना खुला हो कि पाठक को शेर का केंद्रीय ख़याल पकड़ने में मुश्किल हो, तो शेर की तरतीब पर ग़ौर करना मुनासिब हो जाता है।
यहाँ भी बेहतर आलोचना का तरीक़ा यही है कि शेर की ख़ूबी को स्वीकार किया जाए, उसके इशारों को समझा जाए और जहाँ फ़न्नी या मानी की कमज़ोरी हो, उसे दलील के साथ बयान किया जाए।
10. आख़िरी शेर: तन्हाई, यादें और ज़िंदगी
अपना नहीं था कोई भी जिस वक़्त मेरे पास,
यादों के साथ-साथ बिताई है ज़िन्दगी।
यह शेर ग़ज़ल के सबसे आसानी से समझ आने वाले जज़्बात में से एक को बयान करता है: तन्हाई।
जब कोई अपना पास नहीं होता, तो इंसान अक्सर यादों के सहारे वक़्त गुज़ारता है। यादें कभी मरहम बनती हैं और कभी उसी ज़ख़्म को ताज़ा कर देती हैं जिसे भरने में बरसों लग जाते हैं।
इस शेर की कशिश उसकी सादगी में है। इसमें कोई मुश्किल इस्तिआरा नहीं, कोई पेचीदा फ़लसफ़ा नहीं; बस एक एहसास है जिसे बहुत-से लोग अपनी ज़िंदगी से जोड़ सकते हैं।
लेकिन शायरी में सादगी और फ़न्नी पुख़्तगी को एक-दूसरे का मुतरादिफ़ नहीं समझना चाहिए। आसान ज़बान में भी बेहतरीन शेर कहा जा सकता है, और मुश्किल अल्फ़ाज़ के बावजूद कमज़ोर शेर भी मौजूद हो सकता है।
इसलिए इस आख़िरी शेर की भी मुकम्मल तक़्तीअ ज़रूरी है। जब तक पूरी ग़ज़ल के सभी मिसरों का वज़्न सामने न हो, तब तक सिर्फ़ कुछ मिसरों की बुनियाद पर पूरी ग़ज़ल के हर हिस्से के बारे में एक ही दर्जे का फ़ैसला सुनाना एहतियात के ख़िलाफ़ होगा।
यह एहतियात आलोचना को कमज़ोर नहीं करती; बल्कि उसे ज़्यादा भरोसेमंद बनाती है।
11. वायरल होना और अदबी मयार: दोनों की दुनिया अलग है
आज सोशल मीडिया पर शायरी की मक़बूलियत कई चीज़ों से तय होती है। किसी की आवाज़ बहुत अच्छी हो सकती है, किसी की अदायगी में असर हो सकता है, किसी वीडियो की पेशकश दिलकश हो सकती है और किसी मिसरे में ऐसा जज़्बाती पहलू हो सकता है जो बड़ी तादाद में लोगों को अपनी तरफ़ खींच ले।
यह सब अपनी जगह क़ाबिल-ए-क़द्र है।
लेकिन सोशल मीडिया की मक़बूलियत को अदबी मयार का आख़िरी पैमाना बना देना एक अलग मसला है। वायरल होने का मतलब यह है कि बहुत-से लोगों ने किसी कलाम को सुना, देखा, पसंद किया या साझा किया। इससे यह साबित नहीं होता कि उस कलाम की हर फ़न्नी शर्त पूरी हो गई है।
इसी तरह किसी कलाम में अरूज़ी कमी निकल आने का यह मतलब भी नहीं कि उसे पसंद करने वाले लाखों लोग ग़लत हैं। हो सकता है वे उसके जज़्बात से मुतास्सिर हों, उसके ख़याल को पसंद करते हों या उसकी अदायगी को सराहते हों।
मगर अगर हम ग़ज़ल को एक फ़न्न मानते हैं, तो उसकी तकनीकी शर्तों को समझना और उनका सम्मान करना भी ज़रूरी है।
लोकप्रियता कलाम को लोगों तक पहुँचाती है; फ़न्नी पुख़्तगी उसे आलोचना की सख़्त कसौटी पर टिकने की क़ुव्वत देती है।
इन दोनों में कोई दुश्मनी नहीं। एक कलाम दोनों में कामयाब हो सकता है। मगर जब दोनों के बीच फ़र्क़ पैदा हो, तो उस फ़र्क़ को पहचानना अदबी ज़िम्मेदारी है।
12. क्या हर ग़लती पर शायर को निशाना बनाना चाहिए?
बिल्कुल नहीं।
अरूज़ एक बाक़ायदा इल्म है और उसे सीखने में वक़्त लगता है। ग़ज़ल कहने वाला कोई भी शख़्स शुरुआत में ग़लतियाँ कर सकता है। पुराने और बड़े शायरों के कलाम पर भी अरूज़, ज़बान और मानी के हवाले से बहस होती रही है।
इसलिए किसी शायर के एक मिसरे में वज़्न की कमी की निशानदेही करना और उस शायर की पूरी शख़्सियत या उसकी सारी कोशिशों को ख़ारिज कर देना एक ही बात नहीं है।
फ़न्नी आलोचना का मक़सद किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि कलाम को बेहतर समझना है।
अगर किसी मिसरे में वज़्न टूट रहा है, तो बेहतर तरीक़ा यह है कि उसकी तक़्तीअ सामने रखी जाए। बताया जाए कि कौन-सा हिज्जा कहाँ बैठ रहा है, कौन-सा रुक्न पूरा नहीं हो रहा और क्या कोई जायज़ अरूज़ी गुंजाइश मौजूद है। अगर कोई वैकल्पिक तरतीब सुझाई जा सकती है, तो उसे भी पेश किया जाए।
इससे पाठक को सिर्फ़ एक फ़ैसला नहीं मिलता, बल्कि वह फ़ैसले की बुनियाद भी समझता है।
आख़िरकार, शायरी की दुनिया में इल्मी बहस की अहमियत इसी बात में है कि उसमें दलील को शख़्सियत से ऊपर रखा जाए।
13. क्या इस ग़ज़ल की इस्लाह मुमकिन है?
अगर किसी मिसरे में वज़्न की कमी साबित हो जाए, तो आम तौर पर उसकी इस्लाह की कोशिश की जा सकती है। मगर इस्लाह का मतलब केवल किसी लफ़्ज़ को बदल देना नहीं होता।
कभी एक लफ़्ज़ बदलने से मिसरे का वज़्न दुरुस्त हो जाता है, लेकिन उसका मानी कमज़ोर पड़ जाता है। कभी मानी बचाने के लिए जुमले की पूरी तरतीब बदलनी पड़ती है। और कभी शायर को अपने पसंदीदा ख़याल को नए अल्फ़ाज़ में बयान करना पड़ता है।
यही वह मरहला है जहाँ शायर के फ़न्न, ज़बान पर उसकी पकड़ और तख़य्युल का असल इम्तिहान होता है।
एक अच्छा शायर केवल ख़याल पैदा नहीं करता; वह उस ख़याल के लिए सही लफ़्ज़, सही तरतीब और सही आहंग भी तलाश करता है।
अगर कोई मिसरा अपनी पहली शक्ल में बहर पर पूरा नहीं उतरता, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसका ख़याल बेकार है। मुमकिन है कि उसी ख़याल को थोड़ी-सी तब्दीली के साथ कहीं बेहतर शेर में बदला जा सके।
मगर इस्लाह से पहले यह ज़रूरी है कि ग़लती की सही पहचान हो। जिस जगह वज़्न वास्तव में नहीं टूट रहा, वहाँ महज़ अंकों के आधार पर उसे ग़लत क़रार देना भी दुरुस्त नहीं।
इसलिए 'कभी' और 'सभी के' वाले मिसरों के बारे में अंतिम अरूज़ी फ़ैसला मुकम्मल तक़्तीअ, वास्तविक अदायगी और बहर में मान्य गुंजाइशों की जाँच के बाद ही होना चाहिए।
14. ग़ज़ल कहने वालों के लिए इस बहस में क्या सबक़ है?
इस ग़ज़ल के हवाले से कुछ बातें हर उस शख़्स के लिए अहम हैं जो ग़ज़ल कहने का शौक़ रखता है।
पहला सबक़: बहर को केवल नाम से नहीं, अमल से सीखिए। किसी बहर का नाम याद कर लेना काफ़ी नहीं। उसके अरकान, हिज्जों की बनावट और तक़्तीअ की मश्क़ ज़रूरी है।
दूसरा सबक़: मिसरे को ज़ोर से पढ़िए, मगर केवल कान पर भरोसा मत कीजिए। कभी कोई मिसरा सुनने में रवाँ लगता है, लेकिन तक़्तीअ में उसका वज़्न अलग निकलता है। कान और इल्म दोनों की मदद लीजिए।
तीसरा सबक़: ख़याल के लिए ज़बान को क़ुर्बान मत कीजिए। अगर कोई ख़याल किसी एक तरतीब में बहर पर नहीं बैठ रहा, तो दूसरी तरतीब तलाश कीजिए।
चौथा सबक़: सोशल मीडिया की तारीफ़ को अंतिम प्रमाण मत समझिए। लोगों का पसंद करना आपकी हौसला-अफ़ज़ाई है, लेकिन फ़न्न सीखने की ज़रूरत को ख़त्म नहीं करता।
पाँचवाँ सबक़: आलोचना को दुश्मनी मत समझिए। अगर कोई शख़्स दलील के साथ किसी मिसरे की कमी बताता है, तो उस पर ग़ौर करना चाहिए। और अगर उसकी दलील ग़लत है, तो बेहतर तक़्तीअ पेश करके उसका जवाब दिया जा सकता है।
इन उसूलों पर अमल करने से ग़ज़ल का ज़ौक़ भी बढ़ता है और इल्म भी।
15. आख़िरी बात: ग़ज़ल की इज़्ज़त उसके फ़न्न की इज़्ज़त में है
पायल भटनागर जी की इस ग़ज़ल की लोकप्रियता अपनी जगह एक हक़ीक़त है। उसके अशआर में ऐसे जज़्बात मौजूद हैं जिनसे बहुत-से लोग जुड़ सकते हैं। मगर किसी कलाम का मक़बूल होना उसे अरूज़ी आलोचना से ऊपर नहीं उठा देता।
इस ग़ज़ल के दूसरे शेर में 'देखा है कभी आपने मंज़र वो मौत का' के भीतर 'कभी' के वज़्न पर सवाल उठाया जा रहा है। इसी तरह 'हँसते हुए दिखाये हैं किरदार सभी के' में 'सभी के' के वज़्न को आख़िरी रुक्न 212 के मुक़ाबले में 122 माना जा रहा है। अगर मुकम्मल तक़्तीअ और अदायगी की जाँच इन एतराज़ात की तस्दीक़ करती है, तो इन मिसरों में बहर की पाबंदी का मसला गंभीर है।
साथ ही, यह भी ज़रूरी है कि इस आलोचना को किसी शायर की नीयत, मेहनत या शख़्सियत पर हमला न बनाया जाए। फ़न्नी सवाल का जवाब फ़न्नी दलील से ही दिया जाना चाहिए।
शायरी में सबसे आसान काम किसी मिसरे को पसंद कर लेना है। उससे थोड़ा मुश्किल काम उसके मानी तक पहुँचना है। मगर सबसे मुश्किल काम यह है कि हम उसके ख़याल, उसकी ज़बान, उसकी बहर और उसकी पूरी तामीर को एक साथ समझ सकें।
ग़ज़ल केवल एहसास का नाम नहीं; यह एहसास को एक ख़ास फ़न्नी साँचे में ढालने का हुनर भी है।
और शायद इसी लिए ग़ज़ल की असल ख़ूबसूरती उस वक़्त सामने आती है जब अल्फ़ाज़ दिल को भी छूते हैं और अरकान की पाबंदी भी निभाते हैं।
क्योंकि वायरल होना एक कलाम की पहुँच का बयान है, जबकि बहर पर पूरा उतरना उसके फ़न्न का सवाल है। दोनों को एक समझ लेना शायरी के साथ इंसाफ़ नहीं होगा।
तारिक़ अज़ीम 'तन्हा' की अदबी टिप्पणी
नोट: यह लेख उपलब्ध मिसरों और बताए गए वज़्न के आधार पर फ़न्नी जायज़े की कोशिश है। अरूज़ी निष्कर्ष को अंतिम रूप देने के लिए हर मिसरे की मुकम्मल तक़्तीअ, लफ़्ज़ों की वास्तविक अदायगी और संबंधित बहर में मान्य ज़िहाफ़ात व अन्य गुंजाइशों की जाँच ज़रूरी है।
तारिक़ अज़ीम तनहा
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