हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए — तारिक़ अज़ीम 'तनहा' की ग़ज़ल और तशरीह
शायर: तारिक़ अज़ीम 'तनहा'
सिन्फ़: ग़ज़ल
ज़बान: उर्दू-फ़ारसी आमेज़ हिंदुस्तानी
मौज़ू: इश्क़, हिज्र, इंसानी ख़्वाहिश, किरदार, रूहानियत, रुस्वाई और जुनूँ
ग़ज़ल — देवनागरी लिपि
हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए,
अश्क़ों का नूर आँख से बहना भी चाहिए।
यूँ तो तेरी ज़बाँ पे है जन्नत की आरज़ू,
चेहरे से तेरे लगता है दुनिया भी चाहिए।
मंज़िल का शौक़ दे दिया तो हौसला भी दे,
ये मैंने कब कहा मुझे रास्ता भी चाहिए।
हुस्न-ओ-जमाल आपका काफ़ी नहीं जनाब,
किरदार का ये फूल महकना भी चाहिए।
हर शै में तू अयाँ है तो पर्दा है किस लिए,
नज़रों को अब मेरी तेरा जल्वा भी चाहिए।
रुस्वाइयों का ताज तो सर पर सजा लिया,
अब इसके साथ थोड़ा-सा चर्चा भी चाहिए।
'तनहा' किसी मक़ाम पे ठहरा नहीं है इश्क़,
इसको जुनूँ के साथ तमाशा भी चाहिए।
— तारिक़ अज़ीम 'तनहा'
Ghazal in Roman Urdu
Hijraan ki raat hai to ujaala bhi chahiye,
Ashkon ka noor aankh se behna bhi chahiye.
Yoon to teri zabaan pe hai jannat ki aarzoo,
Chehre se tere lagta hai duniya bhi chahiye.
Manzil ka shauq de diya to hausla bhi de,
Ye maine kab kaha mujhe raasta bhi chahiye.
Husn-o-jamaal aapka kaafi nahin janaab,
Kirdaar ka ye phool mehakna bhi chahiye.
Har shai mein tu ayaan hai to parda hai kis liye,
Nazron ko ab meri tera jalwa bhi chahiye.
Ruswaiyon ka taaj to sar par saja liya,
Ab iske saath thoda-sa charcha bhi chahiye.
'Tanha' kisi maqaam pe thehra nahin hai ishq,
Isko junoon ke saath tamaasha bhi chahiye.
— Tariq Azeem Tanha
غزل — اردو رسم الخط
ہجراں کی رات ہے تو اُجالا بھی چاہیے،
اشکوں کا نور آنکھ سے بہنا بھی چاہیے۔
یوں تو تری زباں پہ ہے جنت کی آرزو،
چہرے سے تیرے لگتا ہے دنیا بھی چاہیے۔
منزل کا شوق دے دیا تو حوصلہ بھی دے،
یہ میں نے کب کہا مجھے راستہ بھی چاہیے۔
حسن و جمال آپ کا کافی نہیں جناب،
کردار کا یہ پھول مہکنا بھی چاہیے۔
ہر شے میں تو عیاں ہے تو پردہ ہے کس لیے،
نظروں کو اب مری ترا جلوہ بھی چاہیے۔
رسوائیوں کا تاج تو سر پر سجا لیا،
اب اس کے ساتھ تھوڑا سا چرچا بھی چاہیے۔
'تنہا' کسی مقام پہ ٹھہرا نہیں ہے عشق،
اس کو جنوں کے ساتھ تماشا بھی چاہیے۔
— طارق عظیم تنہا
ग़ज़ल की फ़न्नी जानकारी
बहर: मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
अरकान: मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
वज़्न: 221 | 2121 | 1221 | 212
रदीफ़: भी चाहिए
बहर क्या है?
अरूज़ में बहर उस ख़ास वज़्न और लयबद्ध साँचे को कहते हैं जिसके मुताबिक़ ग़ज़ल के मिसरे कहे जाते हैं। एक ही बहर की पाबंदी से ग़ज़ल के अशआर में एक ख़ास मौसीक़ियत और हम-आहंगी पैदा होती है।
इस ग़ज़ल के लिए मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़ बहर और उसके बताए गए अरकान दर्ज किए गए हैं। अरकान की व्यावहारिक जाँच करते समय अल्फ़ाज़ के सही तलफ़्फ़ुज़, हिज्जों की बनावट और ज़िहाफ़ के उसूलों को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है।
रदीफ़ और क़ाफ़िया
ग़ज़ल में बार-बार आने वाले लफ़्ज़ों या अल्फ़ाज़ के समूह को रदीफ़ कहते हैं। यहाँ “भी चाहिए” को रदीफ़ के तौर पर रखा गया है।
रदीफ़ से पहले आने वाले क़ाफ़िया-अल्फ़ाज़ का आपस में मुनासिब हम-आहंग होना भी पारंपरिक ग़ज़ल का अहम उसूल है। इस पाठ में आए अल्फ़ाज़ की क़ाफ़ियाई पाबंदी और तमाम मिसरों की तक़्तीअ की अलग से जाँच की जानी चाहिए।
ग़ज़ल की तफ़सीली तशरीह
पहला शेर: हिज्र की रात और अश्क़ों का नूर
हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए,
अश्क़ों का नूर आँख से बहना भी चाहिए।
आसान मतलब
जब जुदाई की रात है, तो उसमें उजाले की भी ज़रूरत है। अगर आँखों से आँसू बह रहे हैं, तो उन आँसुओं में भी कोई नूर होना चाहिए।
यह शेर जुदाई के दुख को केवल अँधेरे और मायूसी के रूप में पेश नहीं करता। शायर चाहता है कि ग़म के भीतर भी कोई रौशनी, कोई उम्मीद और कोई मानी मौजूद रहे।
“हिज्राँ की रात” का तसव्वुर
हिज्र का मतलब है जुदाई, फ़िराक़ और महबूब से दूरी। रात का तसव्वुर तन्हाई, इंतज़ार और बेचैनी की कैफ़ियत पैदा करता है।
लेकिन शायर इसी रात के साथ उजाले की माँग करता है। वह रात को मिटाने की बात नहीं करता, बल्कि रात के रहते हुए रौशनी चाहता है।
यहाँ रात और उजाला एक-दूसरे के मुक़ाबिल रखे गए हैं। इस तज़ाद से शेर का असर पैदा होता है।
“अश्क़ों का नूर” क्या है?
अश्क़ यानी आँसू आम तौर पर दुख और बेबसी की अलामत हैं। नूर यानी रौशनी। शायर इन दोनों को एक साथ रखकर आँसुओं को एक नई मानी-आफ़रीनी देता है।
अब आँसू केवल ग़म का इज़हार नहीं, बल्कि किसी गहरे एहसास, मोहब्बत या रूहानी तजुर्बे की रौशनी भी बन सकते हैं।
दोनों मिसरों का रिश्ता
पहले मिसरे में रात के भीतर उजाले की तलब है। दूसरे मिसरे में आँसुओं के भीतर नूर की तलब है।
इस तरह बाहरी अँधेरा और भीतरी कैफ़ियत एक-दूसरे के जवाब बन जाते हैं।
फ़न्नी पहलू: तज़ाद, इस्तिआरा और तसवीरकशी।
केंद्रीय ख़याल: दुख के भीतर भी रौशनी की तलाश।
दूसरा शेर: जन्नत की आरज़ू और दुनिया की ख़्वाहिश
यूँ तो तेरी ज़बाँ पे है जन्नत की आरज़ू,
चेहरे से तेरे लगता है दुनिया भी चाहिए।
आसान मतलब
तुम्हारी ज़बान पर तो जन्नत की ख़्वाहिश है, मगर तुम्हारे चेहरे से लगता है कि तुम्हें दुनिया की चाहत भी है।
यहाँ शायर इंसान की कही हुई बातों और उसकी दूसरी ख़्वाहिशों के बीच मौजूद फ़र्क़ को सामने लाता है।
पहला मिसरा
“तेरी ज़बाँ पे है जन्नत की आरज़ू” में जन्नत एक बुलंद मक़सद और आख़िरत की कामयाबी की अलामत है।
शायर ऐसे शख़्स को मुख़ातिब करता है जो अपनी ज़बान से रूहानी और पाकीज़ा ख़्वाहिश का इज़हार करता है।
दूसरा मिसरा
“चेहरे से तेरे लगता है दुनिया भी चाहिए” में शायर ज़बान के मुक़ाबले चेहरे को रखता है।
ज़बान पर जन्नत है, मगर चेहरे से दुनिया की चाहत का गुमान होता है। यहाँ “लगता है” एक अहम तर्कीब है। शायर सामने वाले की नीयत का क़तई फ़ैसला सुनाने के बजाय अपने तास्सुर को बयान करता है।
इससे शेर में तंज़ पैदा होता है।
शेर की गहरी परत
इसे ऐसे शख़्स पर तंज़ समझा जा सकता है जो रूहानियत की बातें तो करता है, मगर दुनियावी फ़ायदों से भी हाथ नहीं धोना चाहता।
लेकिन इसकी एक दूसरी पढ़त भी है। इंसान आख़िरत की कामयाबी और दुनिया की ख़ुशियाँ दोनों चाहता है। इसलिए यह शेर इंसानी फ़ितरत के दोहरेपन को भी बयान करता है।
फ़न्नी पहलू: तज़ाद, तंज़ और इशारियत।
केंद्रीय ख़याल: इंसान जो कहता है, उसकी तमाम ख़्वाहिशें हमेशा सिर्फ़ वही नहीं होतीं।
तीसरा शेर: मंज़िल की तलब और हौसले की ज़रूरत
मंज़िल का शौक़ दे दिया तो हौसला भी दे,
ये मैंने कब कहा मुझे रास्ता भी चाहिए।
आसान मतलब
अगर तुमने मेरे भीतर मंज़िल तक पहुँचने की चाहत पैदा की है, तो मुझे उसे हासिल करने का हौसला भी दो। मैंने तो यह नहीं कहा था कि मुझे रास्ता भी चाहिए।
पहला मिसरा
मंज़िल किसी मक़सद या हासिल की जाने वाली कामयाबी की अलामत है। शौक़ उस मक़सद की चाहत है, जबकि हौसला मुश्किलों का सामना करने की क़ुव्वत है।
शायर एक दिलचस्प माँग पेश करता है: मंज़िल की तलब पैदा करना काफ़ी नहीं; उस तलब को पूरा करने की ताक़त भी चाहिए।
दूसरा मिसरा
“ये मैंने कब कहा मुझे रास्ता भी चाहिए” एक सवालिया अंदाज़ है।
आम तौर पर मंज़िल पाने के लिए रास्ते की ज़रूरत होती है। मगर शायर कहता है कि मैंने रास्ते की माँग ही कब की?
यहाँ रास्ता सिर्फ़ सड़क नहीं, बल्कि रहनुमाई, तयशुदा तरीक़े और सहूलतों का इस्तिआरा भी बन सकता है।
शेर में एक बाग़ियाना कैफ़ियत है। शायर अपने इरादे को किसी तैयार नक़्शे का पाबंद नहीं बनाना चाहता।
दोनों मिसरों का रिश्ता
पहला मिसरा हौसले की माँग करता है। दूसरा मिसरा रास्ते की ज़रूरत को चुनौती देता है।
यानी शायर को मंज़िल की चाहत और अपनी क़ुव्वत पर भरोसा है; वह हर चीज़ पहले से तैयार मिलने का मुतमन्नी नहीं।
फ़न्नी पहलू: इस्तिफ़हामिया अंदाज़, इस्तिआरा और तंज़ीम-ए-ख़याल।
केंद्रीय ख़याल: मंज़िल की चाहत के साथ उसे हासिल करने का हौसला भी ज़रूरी है।
चौथा शेर: हुस्न-ओ-जमाल और किरदार की ख़ुशबू
हुस्न-ओ-जमाल आपका काफ़ी नहीं जनाब,
किरदार का ये फूल महकना भी चाहिए।
आसान मतलब
आपकी ख़ूबसूरती अपनी जगह, मगर वह काफ़ी नहीं। आपके किरदार में भी फूल जैसी ख़ुशबू होनी चाहिए।
पहला मिसरा
हुस्न और जमाल दोनों ख़ूबसूरती, दिलकशी और आकर्षण के मफ़हूम रखते हैं। इन्हें साथ लाने से बाहरी ख़ूबसूरती का तसव्वुर उभरता है।
लेकिन “काफ़ी नहीं” कहकर शायर यह स्पष्ट करता है कि केवल बाहरी ख़ूबसूरती इंसान की मुकम्मल पहचान नहीं है।
“जनाब” में अदब भी है और हल्की-सी तंज़ की धार भी।
दूसरा मिसरा
“किरदार का फूल महकना” इस शेर की केंद्रीय तसवीर है।
किरदार एक अमूर्त चीज़ है। शायर उसे फूल की शक्ल देता है और उसके महकने की बात करता है।
फूल का दिखाई देना और उसकी ख़ुशबू का महसूस होना अलग-अलग बातें हैं। इसी तरह इंसान का अच्छा दिखाई देना और उसका अच्छे किरदार का मालिक होना अलग बातें हैं।
दोनों मिसरों का रिश्ता
पहले मिसरे में आँखों को मुतास्सिर करने वाला हुस्न है। दूसरे में दिल और ज़ेहन पर असर छोड़ने वाला किरदार।
यहाँ शायर बाहरी ख़ूबसूरती का इनकार नहीं करता, बल्कि उसे अधूरा बताता है।
फ़न्नी पहलू: इस्तिआरा, हुस्न और किरदार का तज़ाद।
केंद्रीय ख़याल: असल दिलकशी अच्छे किरदार से मुकम्मल होती है।
पाँचवाँ शेर: हर शै में तजल्ली और दीदार की तलब
हर शै में तू अयाँ है तो पर्दा है किस लिए,
नज़रों को अब मेरी तेरा जल्वा भी चाहिए।
आसान मतलब
अगर तू हर चीज़ में ज़ाहिर है, तो फिर पर्दा किस लिए है? अब मेरी आँखों को तेरा जल्वा भी चाहिए।
पहला मिसरा
“हर शै में तू अयाँ है” एक वसीअ तसव्वुर है। अयाँ का मतलब है ज़ाहिर और नुमायाँ।
यहाँ “तू” महबूब भी हो सकता है और रूहानी ताबीर में माबूद या हक़ीक़त-ए-मुतलक़ भी।
अगर महबूब हर शै में मौजूद है, तो फिर पर्दे और हिजाब का सवाल क्यों बाक़ी है? इसी सवाल से शेर का फ़लसफ़ियाना पहलू पैदा होता है।
दूसरा मिसरा
“नज़रों को अब मेरी तेरा जल्वा भी चाहिए” में शायर अपनी तलब को सामने लाता है।
जल्वा सिर्फ़ दिखाई देने का नाम नहीं, बल्कि ऐसी नुमूद और तजल्लियात का तसव्वुर है जो दिल पर असर करे।
“अब” का लफ़्ज़ किसी इंतज़ार के बाद पैदा होने वाली बेचैनी का एहसास देता है।
दोनों मिसरों का रिश्ता
पहले मिसरे में महबूब की मौजूदगी का दावा है। दूसरे में उसके दीदार की तलब।
किसी हक़ीक़त को मान लेना और उसे अपने तजुर्बे में महसूस करना दो अलग मरहले हैं। यही फ़र्क़ इस शेर को फ़लसफ़ियाना गहराई देता है।
फ़न्नी पहलू: इस्तिफ़हामिया अंदाज़, रूहानी इशारियत और तज़ाद।
केंद्रीय ख़याल: मौजूदगी का एहसास और दीदार की कैफ़ियत एक नहीं हैं।
छठा शेर: रुस्वाई का ताज और चर्चा की ख़्वाहिश
रुस्वाइयों का ताज तो सर पर सजा लिया,
अब इसके साथ थोड़ा-सा चर्चा भी चाहिए।
आसान मतलब
बदनामी का ताज तो मैंने अपने सर पर सजा लिया है; अब इसके साथ कुछ चर्चा भी होनी चाहिए।
पहला मिसरा
रुस्वाई यानी बदनामी और बेइज़्ज़ती। ताज आम तौर पर इज़्ज़त, बुलंदी और हुकूमत की अलामत होता है।
लेकिन शायर रुस्वाई का ताज बनाकर एक उलटी तसवीर पैदा करता है। जिस चीज़ को इंसान आम तौर पर छिपाना चाहता है, उसे यहाँ सर पर सजाया गया है।
“सजा लिया” में एक क़िस्म का इख़्तियार सुनाई देता है। जैसे शायर अपनी रुस्वाई को अपने वजूद का हिस्सा बना चुका हो।
दूसरा मिसरा
“अब इसके साथ थोड़ा-सा चर्चा भी चाहिए” में तंज़ की कैफ़ियत है।
पहले रुस्वाई मिली, अब शायर उसके साथ चर्चा भी चाहता है। इससे बदनामी और शोहरत के बीच का फ़र्क़ धुँधला होने लगता है।
इसे दुनिया की शोहरत-परस्ती पर तंज़ समझा जा सकता है। यह उस कैफ़ियत का बयान भी हो सकता है जिसमें इंसान अपनी बदनामी को ही अपनी पहचान बना लेता है।
दोनों मिसरों का रिश्ता
पहले मिसरे में रुस्वाई का हासिल है। दूसरे में उसी के साथ चर्चा की ख़्वाहिश।
दूसरा मिसरा पहले मिसरे को एक नए नज़रिए से पढ़ने पर मजबूर करता है।
फ़न्नी पहलू: इस्तिआरा, तज़ाद और तंज़।
केंद्रीय ख़याल: कभी-कभी बदनामी भी इंसान की पहचान और शोहरत का ज़रिया बन जाती है।
सातवाँ शेर: मक़्ता — इश्क़ का जुनूँ और तमाशे की तलब
'तनहा' किसी मक़ाम पे ठहरा नहीं है इश्क़,
इसको जुनूँ के साथ तमाशा भी चाहिए।
आसान मतलब
ऐ 'तनहा', इश्क़ किसी एक मुक़ाम पर ठहरकर रहने वाला नहीं है। उसे जुनूँ के साथ तमाशा भी चाहिए।
पहला मिसरा
मक़ाम का मतलब यहाँ केवल जगह नहीं, बल्कि दर्जा, मंज़िल या किसी हासिल की हुई कैफ़ियत भी हो सकता है।
शायर कहता है कि इश्क़ किसी एक मुक़ाम पर ठहरता नहीं। उसकी फ़ितरत में तहरीक, तलाश और बे-क़रारी शामिल है।
यह एक फ़लसफ़ियाना ख़याल है: इश्क़ केवल किसी मंज़िल तक पहुँचने का नाम नहीं, बल्कि लगातार बदलने और नए तजुर्बे हासिल करने की कैफ़ियत भी है।
दूसरा मिसरा
जुनूँ का मतलब शिद्दत, दीवानगी और किसी एहसास में हद से गुज़र जाना है।
लेकिन शायर जुनूँ पर बात ख़त्म नहीं करता। वह कहता है कि इश्क़ को तमाशा भी चाहिए।
तमाशा यहाँ कई मानी पैदा करता है:
- कोई नुमायाँ और दिलचस्प मंज़र।
- इश्क़ का ऐसा इज़हार जो लोगों की नज़रों में आए।
- दीवानगी की ऐसी कैफ़ियत जो ख़ामोशी से आगे बढ़कर किसी वाक़िए की शक्ल ले ले।
- इश्क़ की दुनिया में पैदा होने वाली हलचल और उथल-पुथल।
तख़ल्लुस का इस्तेमाल
मक़्ते में “तनहा” शायर का तख़ल्लुस है। इसे शामिल करने से शायर अपने ही ख़याल को मुख़ातिब करने का अंदाज़ पैदा करता है।
यहाँ शायर इश्क़ को एक ऐसी ताक़त के रूप में पेश करता है जो ठहराव से संतुष्ट नहीं होती। उसे शिद्दत भी चाहिए और इज़हार भी।
दोनों मिसरों का रिश्ता
पहले मिसरे में इश्क़ की बे-क़रारी है। दूसरे में उस बे-क़रारी के इज़हार की तलब।
इस तरह इश्क़ सिर्फ़ एक अंदरूनी एहसास नहीं रहता, बल्कि एक हरकत, एक इज़हार और एक नुमायाँ कैफ़ियत भी बन जाता है।
फ़न्नी पहलू: तख़ल्लुस, इस्तिआरा और इश्क़ की तहरीक।
केंद्रीय ख़याल: इश्क़ एक मुक़ाम पर ठहरने के बजाय नए तजुर्बे और नए इज़हार तलाश करता है।
ग़ज़ल के सभी अशआर का आपसी रिश्ता
इस ग़ज़ल के तमाम अशआर इंसानी तलब और उसके इज़हार के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाते हैं।
पहले शेर में दुख के साथ रौशनी की माँग है। दूसरे में जन्नत की आरज़ू के साथ दुनिया की ख़्वाहिश। तीसरे में मंज़िल के साथ हौसला। चौथे में हुस्न के साथ किरदार। पाँचवें में मौजूदगी के साथ दीदार। छठे में रुस्वाई के साथ चर्चा। और मक़्ते में जुनूँ के साथ तमाशे की ख़्वाहिश।
इन सबको जोड़ने वाला एक साझा ख़याल है:
सिर्फ़ एक चीज़ का होना काफ़ी नहीं; इंसान उसके साथ किसी दूसरी चीज़ की भी तलब रखता है।
इसी वजह से “भी चाहिए” की बार-बार आमद ग़ज़ल में एक साझा फ़िक्री रिश्ता पैदा करती है। हर शेर में एक मौजूद कैफ़ियत के साथ एक नई माँग जुड़ती है।
ग़ज़ल में इस्तिआरे और तज़ाद
1. रात और उजाला: जुदाई के अँधेरे के साथ उम्मीद की रौशनी।
2. अश्क़ और नूर: दुख को एक रूहानी या मानीख़ेज़ तजुर्बे में बदलना।
3. जन्नत और दुनिया: बुलंद आरज़ू और दुनियावी ख़्वाहिश के बीच तनाव।
4. मंज़िल और रास्ता: मक़सद और उसे हासिल करने के तरीक़े के बीच रिश्ता।
5. हुस्न और किरदार: बाहरी ख़ूबसूरती और अंदरूनी अच्छाई का फ़र्क़।
6. पर्दा और जल्वा: मौजूदगी और दीदार के बीच का फ़लसफ़ियाना सवाल।
7. रुस्वाई का ताज: बदनामी को ताज की शक्ल देना एक उलटी और तंज़िया तसवीर है।
8. जुनूँ और तमाशा: इश्क़ की शिद्दत और उसके इज़हार की तलब।
ग़ज़ल की फ़िक्र और शायर का नज़रिया
इस ग़ज़ल में इंसानी फ़ितरत की एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। इंसान किसी एक हासिल पर रुकता नहीं। वह दुख में भी रौशनी चाहता है, हुस्न के साथ किरदार, और इश्क़ में जुनूँ के साथ इज़हार।
यहाँ “भी चाहिए” महज़ एक दोहराया हुआ जुमला नहीं, बल्कि शायर की फ़िक्र को जोड़ने वाला एक साझा उसूल बन जाता है।
ग़ज़ल के कुछ अशआर तंज़िया हैं, कुछ फ़लसफ़ियाना, और कुछ रूहानी इशारों से भरे हुए हैं। इसी वजह से पाठक इन्हें अपने तजुर्बे और नज़रिए के मुताबिक़ अलग-अलग मानी दे सकते हैं।
फ़न्न-ए-ग़ज़ल के लिहाज़ से अहम नोट
इस ग़ज़ल की बहर और वज़्न के बारे में शायर की दी हुई जानकारी इस प्रकार है:
मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 | 2121 | 1221 | 212
यहाँ बहर का नाम और अरकान शायर की दी हुई जानकारी के मुताबिक़ दर्ज हैं। सभी मिसरों की तक़्तीअ और क़ाफ़िया-रदीफ़ की पाबंदी की स्वतंत्र जाँच एक अलग तकनीकी मरहला है।
पारंपरिक ग़ज़ल में रदीफ़ के साथ क़ाफ़िया और तमाम अशआर में वज़्न की पाबंदी भी अहम होती है। इसलिए ग़ज़ल को फ़न्नी तौर पर मुकम्मल घोषित करने से पहले इन पहलुओं की जाँच करना उचित होगा।
शायर का परिचय
तारिक़ अज़ीम 'तनहा' उर्दू-फ़ारसी रंग की ग़ज़ल, नज़्म और फ़लसफ़ियाना शायरी में दिलचस्पी रखने वाले शायर हैं। उनकी शायरी में इश्क़, इंसानी फ़ितरत, वजूद, समाज और ज़िंदगी के पेचीदा सवालों को अशआर की शक्ल में बयान करने की कोशिश दिखाई देती है।
उनकी शायरी का एक अहम पहलू आम इंसानी कैफ़ियतों के भीतर छिपे हुए गहरे सवालों को तलाश करना है। मोहब्बत, तन्हाई, उम्मीद, किरदार और इंसानी ख़्वाहिश जैसे मौज़ूआत उनकी तख़्लीक़ी दिलचस्पी का हिस्सा हैं।
शायर: तारिक़ अज़ीम 'तनहा'
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