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गांधी जयंती पर ये लेख पढ़ें

दक्षिण अफ्रीका से भारत आये मुझे ढाई साल हो चुके हैं।  इसका चौथाई समय मैनें भारतीय रेलों के  तीसरे दर्जे में सफर करते गुजारा है। यह मेरी चॉइस थी, जिससे आम भारतीय यात्रियों से मिलने, बात करने का अवसर मिलता है। लाहौर से कलकत्ता और कराची से केरल तक सफर किया, और भारत के सभी रेलवे सिस्टम में यात्रा कर चुका हूँ। उनके अफसरों को यात्रियों की अवस्था पर कई पत्र भी लिखे हैं। अब वक्त है कि यह बात प्रेस और जनता तक भी पहुचाई जाये।  इस महीने 12 तारीख को मैनें बॉम्बे से मद्रास का टिकट लिया, जिसमे 13 रुपए 9 आने चुकाए। डिब्बे में 22 यात्रियों के लिए सिर्फ बैठने की सीट थी।  मुझे दो रातों का सफर करना था, लेकिन शायिका नही थी। पूना आते आते 22 लोग भर चुके थे, लेकिन इसलिए कि कुछ तगड़े लोग औरों को घुसने नही दे रहे थे। बैठे बैठे हम कुछ सो पाए,  पर रायचूर के बाद स्थिति गम्भीर हो गयी। लोग घुसते गए। रोकने वालों को रेलवे के आड़े हाथों लिया और डिब्बे में पैसेंजर ठूंस दिए। एक मेमन व्यापारी ने ज्यादा विरोध किया तो कर्मचारियों ने पहले उसे पकड़कर इन्सल्ट किया, फिर टर्मिनल आने पर अफसरों को सौप दिया। ज...

Rani Karnavati Sends Rakhi To Humayun । Mughal Empror Humayun

खानवा जंग में बाबर से हारने के बाद राणा सांगा जख़्मी हालत में बच निकले, जंग में मुग़लों से तो बच गए लेकिन राणा सांगा को उनके ही राजपूत सामंतों ने ज़हर देकर मार डाला।  राणा सांगा की मौत के बाद उनके पत्नी रानी कर्णावती ने बेटे उदय सिंह को गद्दी पर बैठाकर सत्ता संभालने की कोशिश की लेकिन ज़्यादा दिन शासन नही कर सकीं राजपूत सामन्तों ने रानी कर्णावती को सत्ता से हटाने के लिए गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह को निमन्त्रण भेजा। सुल्तान बहादुर शाह चित्तोड़ पर हमले के निकल पड़ा, ये ख़बर रानी कर्णवती को भी पहुच गयी।  रानी कर्णावती ने राखी भेजकर मुग़ल बादशाह हुमायूं से मदद मांगी, चिट्ठी मिलते ही हुमायूं ने अपना बंगाल अभियान अधूरा छोड़कर चित्तोड़ का रुख किया। वह जमाना हाथी-घोड़ों की सवारी का था सेना को साथ लेकर सैकड़ों किमी की दूरी तय करना आसान नहीं था और उसमें वक्त लगना लाज़मी भी था। हुमायूं चित्तौड़ पहुंचे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 8 मार्च 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़गढ़ के किले पर हमला कर दिया था। रानी कर्णवती ने जौहर कर आग में समा चुकी थीं। जब यह खबर बादशाह हुमायूं त...

हिन्दी दिवस स्पेशल

निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति के मूल .. भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने लिखा था, डेढ़ सौ साल पहले। तब वो एक बन्द दुनिया थी। ये दुनिया आगे आने वाले वक्त में खुलने वाली थी, ग्लोबलाइज होने वाली थी। कलोनियलिज्म के दौर में कालोनियल ताकतों ने बन्दूक के जोर पर अपना राजनैतिक प्रभुत्व जमाया। दुनिया के बड़े हिस्से में अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगीज, और डच फैली। इस दौड़ में आखिरकार अंग्रेज इसमे सबसे आगे रहे, नतीजा अंग्रेजी भी दुनिया मे आगे रही। अंग्रेजो ने दुनिया लूटी, धन लूटा और लूट लिया दुनिया का ज्ञान और इतिहास। खोजा भी, जीता भी और खुलकर प्रशंसा कीजिये, कि संरक्षित भी किया। लंदन का विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम, नेशनल म्यूजियम, नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम, और नेशनल आर्काइव में.. इजिप्ट से इंडिया तक, दुनिया का इतिहास बाइज्जत सुरक्षित रखा है। दोस्ती दुश्मनी, गर्व शर्म से परे चले। बगैर लाग लपेट के ब्रिटिश फौजी को नोचते टीपू का शेर विक्टोरिया म्यूजियम में तमीज से संरक्षित है। रोसेटा स्टोन वहां संरक्षित है। इसके मुकाबले कभी कलकत्ता या काहिरा के धूल फांकते म्यूजियम देखिये। अलमारियों में बेतरतीब ठुंसे अर्टिफेक्ट...

पूर्ण चित्र । चंद्रशेखर आज़ाद । ChandraShekhr Aazad

#पूर्ण_चित्र  चंद्रशेखर आजाद जी को अपनी फोटो खिंचवाने से बड़ी चिढ़ होती थी लिहाज़ा बार - बार उनकी एकाध फोटो ही हमारे आसपास घुमती रहती हैं ।  आइए जानते हैं उस बेहद लोकप्रिय फोटो के बारे में जिसमें आजाद अपने मूंछों पर ताव देते नजर आते हैं ।  काकोड़ी कांड के बाद अंग्रेज हाथ धोकर इस डाके में संलिप्त क्रांतिकारियों के पीछे पड़ गए थे । आजाद के साथियों की गिरफ्तारी का सिलशिला शुरू हो चुका था । चारों तरफ जासूसों का जाल बिछा हुआ था ।  आजाद जासूसों से बचते - बचते किसी तरह झांसी पहुंचे । वहां उन्होंने रूद्रनारायण सिंह " मास्टर जी " के आवास में शरण ली । मास्टर जी का आवास कला - संस्कृति और व्यायाम का केंद्र हुआ करता था । सरकारी जासूसों और नौकरशाहों का भी आना - जाना वहां लगा रहता था । इसलिए आजाद ने वहां रूकना मुनासिब नहीं समझा । लाख मना करने के बावजूद भी वह पास के जंगल में एक छोटे से हनुमान मंदिर के पुजारी बनकर रहने लगे ।  फिर एक दिन आजाद को मास्टर जी अपने आवास पर ले आये । कला - प्रेमी होने के साथ - साथ मास्टरजी फोटोग्राफी भी कर लिया करते थे ।  बहुत देर से मा...

खामोशी ही सबसे बेहतर

आप अक्सर ऐसे लोगों से मिलते होंगे जो अपनी अभिव्यक्तियों में बेहद मुखर होते हैं। उनके पास हमेशा बातों का असीम भंडार होता है। किसी भी बातचीत में वे सुनते कम और बोलते ज़्यादा हैं। उन्हें किसी भी मुद्दे पर अपनी राय रखने में कोई संकोच या झिझक महसूस नहीं होती। आमतौर पर ऐसे लोगों को स्मार्ट व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जाता है और अधिकांश लोग चाहते हैं कि वे भी उन्हीं की तरह निस्संकोची तथा मुखर व्यक्तित्व के धनी हों। दूसरी तरफ, आपने कुछ ऐसे व्यक्तियों को भी देखा होगा जो आमतौर पर चुप रहते हैं। जिस मुद्दे पर मुखर व्यक्ति आपस में लड़ने-झगड़ने की मुद्रा में दिखाई पड़ते हैं, उन मुद्दों पर भी ये व्यक्ति एकदम शांत बने रहते हैं। आमतौर पर धारणा यही है कि मौन रहने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व दबा हुआ होता है और प्रायः कोई भी व्यक्ति खुद को इस वर्ग में शामिल नहीं होने देना चाहता। अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को बचपन से ही मुखर होना सिखाते हैं और अगर कोई बच्चा शांत रहता हो तो यह उसके परिवार के लिये चिंता का सबब बन जाता है। आपमें से कुछ पाठक भी ऐसे होंगे जो सामान्यतः चुप रहना पसंद करते होंगे और उन्ह...