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मक़ाम लिख दिया।

मन्ज़िललिखी,मेहनत लिखी,मक़ाम लिखदिया,
जिंदगी की शोहरत का इंतज़ाम लिख दिया!

फिर कहाँ वो धरते फिरते किसी के सर क़त्ल,
लोगो ने मेरे सर ही कत्ले-इल्ज़ाम लिख दिया!

खुद तू तो सोये चैन से, मैं दर-ब-दर फिरू,
क्यों तुमने मेरे हिस्से दर-ओ-बाम लिख दिया!

हाय! कहर से मयखाना उठाने लगे रिन्द भी,
साक़ी ने अपने होंठो का मुझे जाम लिख दिया!

जिंदगी तो क्या हैं एक जुस्तुजू हैं मंज़िल की,
और जिंदगी का मौत ही मकाम लिख दिया!

हमनेजबभी तेरेअक्स-ओ-तसव्वुर पे बात की,
तेरी दिलफरेब अदा को सरे-शाम लिख दिया!

जन्नत भी उसके कदमो को चूमते आई थी,
हमने जब भी माँ के लिए कलाम लिख दिया!

ता-उम्र ना जमाना सितमगर को भूल पायेगा,
'तनहा' ने लहू जो उसका नाम लिखा दिया!

तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

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