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विश्व धनी जगत सेठ और अंग्रेज़ी हुक़ूमत

अपने समय में विश्व का सबसे धनी व्यक्ति जगत सेठ  """""""""""""""""""""""""""""""" मुर्शिदाबाद में नवाब सिराजुद्दौला के समय एक जगत सेठ हुआ करते थे नाम था फतेहचंद , वह मारवाड़ी थे वह अपने समय में विश्व के सबसे धनी व्यक्ति थे , हुंडी व सूद पर क़र्ज़ का कारोबार करते थे ,उनका कारोबार पूरे उत्तर भारत में फैला हुआ था  राजा महाराजा नवाब उन से कर्ज लिया करते थे ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी उनके पैसों के सहारे ही भारत में क़दम जमाए थे वह ईस्ट इंडिया कंपनी को भी कर्ज देते थे  उनके पास कितनी दौलत थी  इस का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता खुद अंग्रेजों का कहना था कि उनकी दौलत ब्रिटेन की कुल जीडीपी से ज़्यादा है  आगे चलकर उन पर राजनीति सवार हुई , नवाब सिराजुद्दौला के विरुद्ध मीर जाफर को खड़ा कर दिया, फिर मीर जाफर की हत्या करा कर उनके भतीजे मीर कासिम को नवाब बना दिया फिर मीर कासिम को भी उनके बच्चों के साथ कत्ल करवा दिया  शुरू में अंग्रेज देखत...

How to write a sher | Ghazal | Tariq Azeem Tanha

कुछ दिनों पहले मैंने एक-एक शे'र पर मश्क़ करने की, जुनूँ करने की बात लिखी थी। कुछ मैसेजेस आए कि और अच्छी तरह समझाइए। ठीक है कोशिश करता हूँ। जो उस्ताद हैं वह इससे आगे न पढ़ें 😀 पहली बात यह कि रदीफ़ और क़ाफ़िया के बारे में मत सोचिए। ख़याल सोचिए। एक उदाहरण के द्वारा समझते हैं। समझिए कुछ देर सोचने पर आपको यह ख़याल आता है  कि "तेरी तस्वीर इसलिए ख़ूबसूरत है क्यूँ कि वह मेरे दिल में रखी है"। ख़याल आपको अच्छा लगा। यह ख़याल छोटी बह्र में बेहतर बैठेगा। आपने सोचा इसे फ़ाइलातुन, मुफ़ाइलुन, फ़ेलुन में बिठाने की कोशिश करते हैं। जो लेखन के शुरुआती दौर में हैं वह शायद (अनुभव से कह रहा हूँ 😀)  ऐसा लिख दें... मैंने रक्खी हुई है दिल में सो, तेरी तस्वीर ख़ूबसूरत है। ख़ुश हो गये.... पोस्ट कर दिया....है ना? बस यही नहीं करना है। यहाँ से आगे इस पर सोचना शुरू करना है। रदीफ़ और क़ाफ़िया का बंधन तो है नहीं। खुले दिल से सोचिए कि इस शे'र को और बेहतर कैसे करें। और सोचेंगे तो दिमाग़ कहेगा, दिल में तस्वीर रखना मतलब किसी से प्यार होना। और प्यार होता है किया नहीं जाता। तो फिर तस्वीर ख़ुद रखने की बात ...

Bahadur Shah Zafar & British Government

बहादुर शाह ज़फर (1837-1857) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू के माने हुए शायर थे। उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया।  क्रांति में असफल होने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा(म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई। बहादुर शाह ज़फ़र का जन्म 24 अक्तूबर, 1775 में हुआ था। उनके पिता अकबर शाह द्वितीय और मां लालबाई थीं। अपने पिता की मृत्यु के बाद जफर 18 सितंबर, 1837 में मुगल बादशाह बने। यह दीगर बात थी कि उस समय तक दिल्ली की सल्तनत बेहद कमजोर हो गई थी और मुगल बादशाह नाममात्र के सम्राट रह गये थे। भारत के प्रथम स्वतंत्रता - संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ज़फर को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। उनके पुत्रों और प्रपौत्रों को ब्रिटिश अधिकारियों ने सरेआम गोलियों से भून डाला। यही नहीं, उन्हें बंदी बनाकर रंगून ले जाया गया, जहां उन्होंने सात नवंबर, 1862 में एक बंदी के रूप में दम तोड़ा। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह ज़फर दरगाह के नाम से जाना जाता है। आज भी ...

साईकल चलाना आज से 20 साल पहले बहुत रोमांच भरा क्यों होता था?

हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी ,  पहला चरण   -   कैंची  दूसरा चरण    -   डंडा  तीसरा चरण   -   गद्दी ... *तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।* *"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे*। और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और *"क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है* । *आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से महरूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था*। हमने ना जाने कितने दफे अपने *घुटने और मुंह तोड़वाए है* और गज़ब की बात ये है कि *तब दर्द भी नही होता था,* गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए। अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी क...

1857: ग़ालिब के लफ़्ज़ों में । Mirza Asadullah Khan Ghalib

1857: मिर्ज़ा ग़ालिब के शब्दों में -  मिर्ज़ा असदुल्लाह खान ग़ालिब को अक्सर बिना किसी राजनीतिक राय वाला रोमांटिक शायर माना जाता है।  इस तथ्य को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है कि वह 1857 के विद्रोह के दौरान दिल्ली में रहते थे और प्रभावित थे।  ग़ालिब और उनकी पत्नी दो दिनों तक बिना भोजन और पानी के बंद रहे और तीसरे दिन उन्हें पटियाला के महाराजा द्वारा भेजे गए सैनिकों द्वारा बचाया गया।  ब्रिटिश सैनिकों ने गालिब की पत्नी के सभी कीमती सामान और गहने लूट लिए और उनके कैद किए गए दोस्तों और रिश्तेदारों को मार डाला।  अपना दुःख और असंतोष व्यक्त करने के लिए ग़ालिब ने अपने दोस्तों और परिवार को पत्र लिखे।  ग़ालिब ने अपने बहनोई अलाउद्दीन अहमद खान को लिखे एक पत्र में अंग्रेजों के हाथों भारतीयों की हार पर शोक व्यक्त करते हुए एक कविता लिखी थी जिसमें बताया गया था कि कैसे दिल्ली का प्रत्येक धूल कण मुस्लिम खून का प्यासा है।  एक अन्य पत्र में उन्होंने बताया कि कैसे दिल्ली एक सैन्य छावनी में तब्दील हो गई।  अल्लाह अल्लाह दिल्ली ना रही, चवन्नी है,  ना किला, ना शहर, ...