Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2026

जंग, जमीर और विजयी भाव का वहम

क्या जंग सिर्फ मैदान मे दुश्मन को हराकर जीती जाती है.. अगर जंग जीतने का यही पैमाना है तो फिर इस दुनिया मे कमज़ोर को ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं। मुझे याद है कि सिक्सथ की उर्दू की किताब मे एक सबक "अब्बू ख़ां की बकरी" के उन्वान से था जिसमे अब्बू ख़ां की तमाम बकरियां रेवड़ के उसूलों को फ़ालो करती थीं सिवाये चांदनी के, और कभी पहाड़ी के उस तरफ़ नहीं जाती थीं जिधर एक भेड़िया रहता था मगर चांदनी एक रात रेवड़ से अलग होकर पहाड़ी के उस तरफ़ गयी और सारी रात उस भेड़िये से लड़कर सुब्ह को हलाक हो गयी। भेड़िये के दांत और पंजे चांदनी से ज़्यादा मज़बूत थे तो आख़िर में चांदनी को मारा जाना था लेकिन क्या चांदनी सिर्फ यूंही मारी गयी कि उसके पास नुकीले दांत और पंजे ना होकर सिर्फ दो सींग थे। नहीं वह इसीलिए मारी गयी क्योकि बकरियो के उस रेवड़ मे उसके अलावा किसी मे भेड़िये से लड़ने का हौसला नहीं था। इस कहानी को सुनिये और एक अपना साइक्लोजिकल टैस्ट कीजिये। अगर आप इस कहानी को पढते हुये भेड़िये के तरफदार हैं तो आप इतने बुज़दिल हैं कि हर हाल मे जीतने वाले की तरफ़ होकर एक जीती हुयी साइड मे होने का साइक्लोजिकल...